बरामुल्ला : बर्फ के नीचे दबी सच्चाई की सिहरन भरी कहानी
— रिपोर्ट : शिवम धवन

नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘बरामुल्ला’ ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया है। फिल्म खत्म होने के बाद भी उसका असर मन में लंबे समय तक बना रहता है — जैसे किसी ठंडी हवा के साथ कोई अनकहा दर्द भीतर उतर गया हो।

फिल्म की पृष्ठभूमि कश्मीर की घाटी है, जहां की बर्फ़ जितनी शांत दिखती है, उसके नीचे की कहानी उतनी ही बेचैन करने वाली है। निर्देशक आदित्य सुहास जांभले ने इस कहानी को रहस्य, अपराध और आध्यात्मिक भय के साथ जोड़ा है, जो अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है।

कहानी की परतें

बरामुल्ला के एक छोटे कस्बे में एक जादू शो के दौरान एक बच्चे का अचानक गायब हो जाना पूरे इलाके को हिला देता है। इसके बाद एक-एक कर बच्चे लापता होने लगते हैं। जांच के लिए पहुंचते हैं डीएसपी रिज़वान शफी सैयद (मनव कौल) — एक सख्त अफसर जो खुद अपने अतीत के साये से घिरा है।

जैसे-जैसे वह अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली) और दो बच्चों के साथ उस शहर में बसता है, उनके घर में अजीब घटनाएं होने लगती हैं — दरवाजों की चरमराहट, किसी अनदेखे कुत्ते की गंध, और रात के सन्नाटे में सुनाई देने वाले कदमों की आवाजें।

निर्देशन और लेखन

आदित्य सुहास जांभले के निर्देशन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के पलायन की ऐतिहासिक पीड़ा को किसी प्रचार की तरह नहीं, बल्कि एक गूंजती हुई याद की तरह पेश किया है। फिल्म की लोकेशन, ध्वनि और कैमरा वर्क घाटी की भयावह ख़ामोशी को जीवंत बना देते हैं।

लेखक त्रयी — आदित्य धर, आदित्य सुहास जांभले और मोनल ठाक्कर — ने कहानी को बड़ी बारीकी से बुना है। फिल्म की शुरुआत भले ही धीमी हो, लेकिन जैसे-जैसे रहस्य खुलने लगते हैं, दर्शक खुद को उस अंधेरे सिरे से बाहर नहीं निकाल पाते।

अभिनय

मनव कौल ने फिर एक बार साबित किया है कि वे हर किरदार में आत्मा डाल देते हैं। उनकी आंखों में छिपा अपराधबोध और गुस्सा दोनों ही महसूस किए जा सकते हैं। भाषा सुम्बली ने एक पीड़ित परंतु दृढ़ महिला का किरदार बेहद सादगी और संवेदना के साथ निभाया है। बाल कलाकार अरिस्ता मेहता और रोहान सिंह ने भी अपनी मासूमियत से कहानी को सजीव कर दिया है।

विशेष उल्लेख

खलनायक के रूप में गौरव पराशर का प्रदर्शन फिल्म की रीढ़ साबित होता है। वहीं, साउंड डिजाइन फिल्म की आत्मा बनकर उभरता है — हर आवाज़, हर सन्नाटा, हर सांस की गूंज आपको कहानी के भीतर खींच लेती है।

निष्कर्ष

‘बरामुल्ला’ डराती नहीं, बल्कि भीतर तक सिहरन पैदा करती है। यह फिल्म आतंक, पलायन और इंसानियत के बीच फंसे उन चेहरों की गवाही देती है जिन्हें इतिहास ने भुला दिया।
बिना किसी शोर के यह फिल्म सच कहती है — “ज्यादा सच्चाई, कम शोर।”

रेटिंग : ⭐⭐⭐✨
जरूर देखें — एक शांत लेकिन झकझोर देने वाला अनुभव।

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