कल्ट क्लासिक की परछाईं में ठिठकी सीक्वल फिल्म
देशभक्ति के गीतों की गूंज बरकरार, लेकिन कहानी, निर्देशन और वीएफएक्स में भारी कमी
एंटरटेनमेंट डेस्क | TWM News
जेपी दत्ता की बॉर्डर भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा युद्ध फिल्मों में शामिल है, जिनके गीत आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी को हर ज़ुबान पर होते हैं। “घर कब आओगे” जैसे गीत हमारे वीर सैनिकों की भावनाओं का स्वर बन चुके हैं। ऐसे में बॉर्डर 2 से उम्मीदें स्वाभाविक थीं, लेकिन यह फिल्म उस विरासत का भार उठाने में कमजोर नज़र आती है।
जहां बॉर्डर (1997) को आज भी सर्वश्रेष्ठ वॉर फिल्मों में गिना जाता है, वहीं बॉर्डर 2 पूरी तरह सनी देओल के कंधों पर टिकी दिखती है। फिल्म में जज़्बा और दम केवल सनी देओल के दृश्यों में महसूस होता है—यहीं दर्शक को लगता है कि वह वाकई किसी बॉर्डर फ्रेंचाइज़ की फिल्म देख रहा है।
अभिनय की बात करें तो वरुण धवन का प्रदर्शन प्रभावित नहीं करता। उनके चयन पर सवाल उठते हैं—किरदार की गंभीरता और भावनात्मक गहराई पर्दे पर उतर नहीं पाती। आयान शेट्टी को अभी अभिनय की बारीकियां सीखने की ज़रूरत है; इस मामले में वे सुनील शेट्टी जैसे अनुभवी कलाकारों से काफी पीछे नज़र आते हैं। वहीं दिलजीत दोसांझ ने सीमित स्क्रीन टाइम में संतुलित और प्रभावी काम किया है।
निर्देशन और कहानी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी हैं। पटकथा ढीली है और घटनाक्रम में वह कसाव नहीं है, जो बॉर्डर को यादगार बनाता था। तुलना में बॉर्डर 2 की कहानी कहीं ठहरती नहीं, न ही वह युद्ध के मनोवैज्ञानिक और मानवीय पहलुओं को गहराई से छू पाती है।
तकनीकी पक्ष में भी निराशा हाथ लगती है। खासकर नेवी से जुड़े वीएफएक्स बेहद कमजोर हैं, जो फिल्मी और बनावटी लगते हैं—युद्ध फिल्म के लिए यह बड़ी चूक है। हालांकि संगीत पक्ष में पुराने कल्ट गीतों की विरासत को नए गायकों ने किसी हद तक संभाला है, लेकिन यह भी फिल्म को पूरी तरह उबार नहीं पाता।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, एक कल्ट क्लासिक को आगे बढ़ाने की खास ज़रूरत नहीं थी। अगर सीक्वल बनाना ही था, तो बेहतर कलाकारों, मज़बूत कहानी और ठोस निर्देशन के साथ बनाया जाना चाहिए था। बॉर्डर 2 भावनाओं का सम्मान करती दिखती है, लेकिन सिनेमा के स्तर पर कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
रेटिंग: ⭐⭐½ (2.5/5)