भगत सिंह से भारत भूषण तिवारी तक  एक विचार की यात्रा या एक त्रासदी?
लेखक: अमर शर्मा, TWM News बिहार
सह-लेखक: अनिरुद्ध नारायण, इंटर्न

बिहार की मिट्टी ने हमेशा क्रांतिकारियों को जन्म दिया है। इतिहास के पन्नों में जब हम भगत सिंह का नाम पढ़ते हैं, तो एक ऐसे युवा की छवि सामने आती है जिसने अपने विचारों और साहस से व्यवस्था को चुनौती दी। आज के दौर में सोशल मीडिया ने एक और नाम को तेजी से लोगों के बीच पहुंचाया  भारत भूषण तिवारी।

भारत भूषण तिवारी को सोशल मीडिया ने एक क्रांतिकारी के रूप में स्थापित किया। उनके कई वीडियो इस बात की गवाही देते हैं कि वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की आवाज थे। वे उन लोगों के लिए खड़े होते थे, जिनकी आवाज अक्सर दबा दी जाती है। खासकर उन पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए, जिनके लिए सिस्टम में लड़ने वाला शायद ही कोई होता है।

भारत भूषण का संघर्ष किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि वह पूरे सिस्टम से था। उनके भाषणों में एक साफ संदेश होता था  व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, और विकास हर व्यक्ति का अधिकार है। यही वजह है कि उनके शब्दों में वजन था और लोग उनसे जुड़ाव महसूस करते थे।

आज सोशल मीडिया पर उनके वीडियो लगातार वायरल हो रहे हैं। लोग उनके साथ बिताए पलों को याद कर रहे हैं, कई लोग भावुक होकर अपनी कहानियां साझा कर रहे हैं कि कैसे भारत भूषण ने उनके लिए खड़े होकर मदद की। यह केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है।

लेकिन इस कहानी का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद पहलू है  उनका अंत।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कहा जा रहा है कि भारत भूषण तिवारी आत्मसमर्पण किया , लेकिन पुलिस ने उनका एनकाउंटर कर दिया। यदि यह सच है, तो यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि कानून और संवैधानिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है जब पुलिस खुद यह दावा करती है कि भारत भूषण की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, तो फिर उन्हें एनकाउंटर में क्यों मारा गया? भारतीय संविधान के तहत अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह अधिकार किसी भी स्थिति में मनमाने ढंग से छीना नहीं जा सकता।

यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है, तो कानून और भी अधिक जिम्मेदारी तय करता है। ऐसे मामलों में पुलिस का पहला कर्तव्य होता है कि वह व्यक्ति को सुरक्षित हिरासत में ले, न कि घातक बल का प्रयोग करे। CrPC की धारा 46 स्पष्ट करती है कि जानलेवा बल का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब सामने से वास्तविक और तात्कालिक खतरा हो।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, जिनके तहत हर एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच, FIR दर्ज करना और मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य है। यानी एनकाउंटर कोई शॉर्टकट न्याय नहीं, बल्कि एक असाधारण स्थिति में लिया गया अंतिम कदम होना चाहिए।

अगर भारत भूषण के पास हथियार था या उन्होंने कोई अपराध किया था, तो भी कानून का रास्ता तय है  गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया और अदालत द्वारा निर्णय। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत हर अपराध के लिए सजा का प्रावधान है, लेकिन सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, न कि पुलिस के पास।

यदि यह सिद्ध होता है कि पुलिस ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो संबंधित अधिकारियों पर IPC की धारा 302 (हत्या) या धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) के तहत कार्रवाई हो सकती है। साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी की मानसिक स्थिति अस्थिर पाई जाती है, तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता भी मानी जाएगी। ऐसे मामलों में सेवा नियमों के तहत निलंबन, बर्खास्तगी और आपराधिक मुकदमा सभी संभावित कदम हैं।

भारत भूषण तिवारी की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें एक युवा व्यवस्था से लड़ते हुए समाज के कमजोर वर्गों के लिए खड़ा होता है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो लोगों ने उनमें देखा।

आज जब उनके वीडियो साझा किए जा रहे हैं, तो यह केवल शोक नहीं, बल्कि एक विचार की विरासत है  एक ऐसी सोच, जो सवाल करती है, जो लड़ती है, और जो बदलाव चाहती है।

क्या भारत भूषण तिवारी एक नए दौर के क्रांतिकारी थे?
या फिर वे उस सिस्टम के शिकार हो गए, जिससे वे लड़ रहे थे?

यह सवाल आज भी खुला है। और इसका जवाब सिर्फ अदालत ही नहीं, बल्कि समाज की चेतना भी तय करेगी।

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