भारत को खाद्य मिलावट के ख़िलाफ़ नीति में बदलाव चाहिए”
अमर शर्मा
नई दिल्ली: भारत आज जिस खाद्य मिलावट की समस्या से जूझ रहा है, वह अब महज़ एक आवधिक कांड नहीं रह गई है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य और सामाजिक प्रबंधन की एक गंभीर विफलता बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा नीति और प्रवर्तन प्रणाली केवल छापेमारी और संवेदनशील मामलों पर कार्रवाई तक सीमित रह गई है, जबकि समस्या की जड़ कहीं गहरी है और उसे रोकने के लिए समग्र नीति परिवर्तन की आवश्यकता है।
भारत में मिलावट सिर्फ़ पारंपरिक बाज़ारों तक सीमित नहीं है — यह प्रसंस्कृत और अर्ध-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों तक फैल चुकी है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार हल्दी में लीड क्रोमैट जैसे भारी धातु संदूषक पाए गए हैं, जो बच्चों के रक्त में खतरनाक बढ़ोतरी का कारण बन सकते हैं। वहीं दूध को पानी, डिटर्जेंट या यूरिया मिलाकर उसकी वज़न बढ़ाने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने की कोशिशें आम हो चुकी हैं।
मिलावटकार केवल गरीब और औद्योगिक वस्तुएँ नहीं बनाते, बल्कि दूध, पनीर, उच्च-मूल्य वाली मसाले और खाद्य तेल जैसे रोज़मर्रा के उत्पादों को भी लक्ष्य बनाते हैं। यह समस्या सिर्फ़ अनियमित विक्रेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आपूर्ति-शृंखला के औपचारिक और अनौपचारिक दोनों नेटवर्कों में फैल चुकी है।
समस्या का मूल कारण
मिलावट का व्यापक होना केवल अपर्याप्त जांच या कड़ी सज़ा की कमी का परिणाम नहीं है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं:
- लाभ-प्रवृत्ति (Profit Motive): बहुत से छोटे निर्माता और व्यापारी कम लागत में अधिक लाभ कमाने के लिए मिलावट करते हैं।
- प्रयाप्त संसाधनों की कमी: खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों के पास परीक्षण प्रयोगशाला, प्रशिक्षित कर्मी और आधुनिक उपकरणों की कमी है। इसी वजह से पता लगाने की तकनीक भी अपराधियों से पीछे चलती है।
- पुराने परीक्षण उपकरण: कई जगह आज भी अपेक्षाकृत पुराने परीक्षण तरीके अपनाए जा रहे हैं, जो आधुनिक मिलावट के तरीकों का पता नहीं लगा पाते।
समाधान की ज़रूरत
अब समय आ गया है कि नीति निर्माता इस समस्या को केवल छापेमारी और ‘आकस्मिक पकड़’ के रूप में न देखें, बल्कि रूट-टू-टिप नीति तैयार करें:
📌 संपूर्ण आपूर्ति-शृंखला निगरानी: सभी उच्च-जोखिम उत्पादों (जैसे मसाले, दूध, तेल) के लिए ट्रेस-एबल सप्लाई-चेन सिस्टम लागू किया जाना चाहिए, ताकि उत्पाद की शुरुआत से लेकर वितरण तक हर कदम की निगरानी हो।
📌 आधुनिक और मोबाइल परीक्षण: राज्य-स्तर पर पोर्टेबल परीक्षण किट और मोबाइल जांच इकाइयाँ तैनात की जानी चाहिए ताकि ग्रामीण और गाँव-स्तर पर मिलावट की रोकथाम संभव हो।
📌 पारदर्शिता और दंड नीति: सैंपल टेस्ट परिणामों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए; दोषियों के खिलाफ स्पष्ट दंड, और क्रूर मिलावट (जैसे भारी धातु संग) के मामलों में आपराधिक मुक़दमा चलाया जाना चाहिए।
📌 उपभोक्ता सशक्तिकरण: लेबलिंग, प्रमाणित मार्क और जागरूकता के ज़रिये उपभोक्ता को यह समझना चाहिए कि वह क्या खा रहा है और उसे असुरक्षित उत्पाद की शिकायत दर्ज कराने का सशक्त अधिकार होना चाहिए।
समाप्ति टिप्पणी
खाद्य मिलावट अब केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह गई है — यह लोक स्वास्थ्य, उपभोक्ता अधिकार और खाद्य सुरक्षा संस्कृति का मुद्दा बन चुकी है। यदि हम सच में भरोसेमंद और सुरक्षित भोजन चाहते हैं, तो सिर्फ़ कार्रवाई नहीं, नीति में बदलाव और वास्तविक निगरानी की व्यवस्था करना अनिवार्य है।