‘स्पेस जेन: चंद्रयान’— ऊँची उड़ान का सपना, लेकिन कहानी में ईंधन कम
पटना | मनोरंजन डेस्क
जियोहॉटस्टार पर रिलीज़ द वायरल फीवर (TVF) की वेब सीरीज़ ‘स्पेस जेन: चंद्रयान’ भारत के अंतरिक्ष इतिहास की दो निर्णायक घटनाओं—चंद्रयान-2 (2019) की असफलता और चंद्रयान-3 (2023) की ऐतिहासिक सफलता—को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करने का साहसिक प्रयास है। मंशा सराहनीय है: इसरो के वैज्ञानिकों को मानवीय रूप में दिखाना, भावनात्मक संघर्षों को सामने लाना और तकनीकी जटिलताओं से परे आम दर्शक तक कहानी पहुँचाना। लेकिन सिर्फ अच्छी मंशा से ही मिशन सफल नहीं होता।
सीरीज़ की शुरुआत चंद्रयान-2 की विफलता के बाद के माहौल से होती है—मीडिया का दबाव, संस्थागत तनाव, राजनीतिक शोर, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और कोविड-19 जैसी बाधाएँ। विज्ञान की गहराई में जाने के बजाय यह शो “पीपल फर्स्ट” दृष्टिकोण अपनाता है और शिवशक्ति प्वाइंट तक पहुँची सफलता के पीछे छिपी मानसिक थकान, आत्म-संदेह और दृढ़ संकल्प को रेखांकित करता है। यह दृष्टि प्रभावी हो सकती थी, मगर प्रस्तुति अक्सर जल्दबाज़ और सतही लगती है।
अभिनय:
नकुल मेहता अर्जुन के किरदार में सीरीज़ की सबसे मजबूत कड़ी हैं—असफलता से जूझता वैज्ञानिक, कारगिल शहीद पिता की विरासत से प्रेरित। उनका संयम और भावनात्मक सच्चाई शो को संभालती है।
श्रेया सरन ईमानदार हैं, पर भूमिका सीमित रह जाती है; कुछ जगहों पर हिंदी डबिंग भी खटकती है।
दानिश सैत का कॉमिक से गंभीर स्वर में अचानक बदलाव असहज लगता है।
प्रकाश बेलावाड़ी इसरो प्रमुख के रूप में स्थिर और भरोसेमंद हैं, जबकि स्पेस सलाहकार मोहनती के रूप में गोपाल दत्त का किरदार परेशान करता है।
लेखन और निर्देशन:
सीरीज़ की सबसे बड़ी कमजोरी लेखन और पेसिंग है। चार साल की राष्ट्रीय यात्रा को केवल पाँच एपिसोड में समेटना भारी पड़ता है। बड़े क्षण अनुभव बनने के बजाय बुलेट पॉइंट्स जैसे निकल जाते हैं। मीडिया ट्रायल, नौकरशाही, राजनीतिक हस्तक्षेप और मानसिक स्वास्थ्य जैसे अहम विषय छुए तो जाते हैं, पर खुलते नहीं। कई बार यह एक परिपक्व ड्रामा से ज़्यादा जल्दबाज़ी में जोड़े गए नोट्स जैसा महसूस होता है।
सकारात्मक पक्ष:
- वैज्ञानिकों पर पड़ने वाला भावनात्मक दबाव प्रभावी ढंग से सामने आता है।
- यह कहानी हर भारतीय तक पहुँचना चाहिए—क्योंकि राष्ट्रीय उपलब्धियाँ मेहनत, धैर्य और त्याग से बनती हैं।
नकारात्मक पक्ष:
- उथले चरित्र-विकास
- अतिरंजित अभिनय
- अत्यधिक गंभीर टोन, जिससे भावनात्मक असर मंद पड़ता है
फाइनल वर्डिक्ट:
‘स्पेस जेन: चंद्रयान’ ईमानदार और सद्भावनापूर्ण प्रयास है, लेकिन स्थिर कक्षा में नहीं आ पाता। नकुल मेहता दमकते हैं, मानवीय दृष्टि सराहनीय है, पर जल्दबाज़ कहानी और कमजोर लेखन इस ऐतिहासिक अवसर को अधूरा छोड़ देते हैं।
उड़ान भरने की कहानी, जो मुश्किल से धरती की गुरुत्वाकर्षण सीमा पार कर पाती है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐