‘बटवारा 1947’ पर दर्शक की तीखी प्रतिक्रिया, फिल्म को बताया ‘गदर’ का पाकिस्तानी संस्करण
मुंबई। सनी देओल, प्रीति जिंटा और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म ‘बटवारा 1947’ को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। एक दर्शक ने फिल्म की कहानी, पटकथा, अभिनय और कथित तौर पर एकतरफा नैरेटिव को लेकर कड़ी आलोचना की है। अपने रिव्यू में दर्शक ने फिल्म को “पाकिस्तान से बनी गदर” बताते हुए इसे ‘अमन की आशा’ और जबरन ‘भाईचारे’ पर आधारित तमाशा करार दिया।
फिल्म की कहानी 14 अगस्त 1947 से शुरू होती है। मेरठ में आजादी के जश्न के बीच दंगे भड़कते हैं और फिल्म में इन दंगों के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार दिखाया गया है। इसके बाद मिर्जा का किरदार, जिसे सनी देओल ने निभाया है, अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चला जाता है। पाकिस्तान पहुंचने के बाद परिवार को एक ऐसा घर मिलता है, जहां पहले से एक बुजुर्ग हिंदू महिला दुर्गा रहती है। इसके बाद मिर्जा का परिवार दुर्गा को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगता है।
पटकथा और कहानी पर सवाल
यह फिल्म असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिसने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जम्या ई नई’ पर आधारित है। हालांकि, रिव्यू में पटकथा को बेहद कमजोर और दिशाहीन बताया गया है। दर्शक के मुताबिक कहानी में तनाव या भावनात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए पर्याप्त बिल्डअप नहीं है और कई दृश्य बिना किसी खास उद्देश्य के आगे बढ़ते हैं।
फिल्म के संवादों को भी रिव्यू में बेहद कमजोर बताया गया है। समीक्षक के अनुसार, फिल्म कई मुद्दों को एक साथ उठाने की कोशिश करती है, लेकिन उनमें से किसी को भी प्रभावी ढंग से विकसित नहीं कर पाती।
अभिनय भी नहीं आया पसंद
सनी देओल के अभिनय पर टिप्पणी करते हुए रिव्यू में कहा गया कि अभिनेता ने इस बार अपेक्षाकृत संयमित किरदार निभाने की कोशिश की है, लेकिन वह भूमिका में प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
प्रीति जिंटा के अभिनय को भी निराशाजनक बताया गया है। वहीं, शबाना आजमी को फिल्म की एकमात्र बड़ी राहत बताया गया है।
अबिमन्यु सिंह को मुख्य खलनायक के रूप में भी रिव्यू में कमजोर बताया गया है। उनके किरदार और पंजाबी लहजे को कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बनावटी बताया गया है।
वहीं, करण देओल को लेकर रिव्यू में बेहद तीखी टिप्पणी की गई है। उनके अभिनय को भावहीन बताते हुए कहा गया कि ऐसा लगता है जैसे वह सिर्फ स्क्रिप्ट पढ़ रहे हों।
‘भाईचारे’ के चित्रण पर उठाए सवाल
रिव्यू में फिल्म के विभाजन और हिंदू-मुस्लिम संबंधों के चित्रण पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। लेखक के अनुसार, फिल्म में हिंदुओं को आक्रामक पक्ष के रूप में दिखाया गया है और इसी वजह से अल्पसंख्यकों के भारत छोड़ने का नैरेटिव सामने आता है।
फिल्म में लाहौर के मुस्लिम समुदाय द्वारा दुर्गा को स्वीकार किए जाने, उसके साथ दिवाली मनाने और उसके अंतिम संस्कार में हिंदू रीति-रिवाज निभाने जैसे दृश्यों का भी उल्लेख किया गया है। रिव्यू में इन दृश्यों को वास्तविक ऐतिहासिक परिस्थितियों से अलग और अत्यधिक आदर्शवादी बताया गया है।
एक मौलवी का किरदार भी दुर्गा को लाहौर में रहने देने के समर्थन में नजर आता है। रिव्यू के मुताबिक फिल्म में इन घटनाओं के जरिए ‘भाईचारा’ और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देने की कोशिश की गई है, लेकिन यह प्रस्तुति दर्शक को स्वाभाविक लगने के बजाय जबरन थोपी हुई महसूस होती है।
प्रोडक्शन और संगीत भी कमजोर
फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक को रिव्यू में औसत से बेहतर बताया गया है, लेकिन गानों को यादगार नहीं माना गया। वहीं, प्रोडक्शन वैल्यू की तुलना 2000 के दशक के शुरुआती दौर के टीवी सीरियल से की गई है।
रिव्यू के अनुसार, फिल्म का तकनीकी और दृश्यात्मक ट्रीटमेंट आज के दौर की फिल्मों के मुकाबले काफी पुराना नजर आता है।
अंतिम फैसला: सिर्फ 1 स्टार
रिव्यू में कहा गया है कि इस नाटक को फिल्म में बदलने का फैसला ही सवालों के घेरे में है और कमजोर पटकथा व बेहद अनुमानित कहानी ने समस्या को और बढ़ा दिया है।
लेखक के मुताबिक फिल्म में ‘अमन की आशा’ और ‘भाईचारे’ का संदेश जरूरत से ज्यादा परोसा गया है। उनका मानना है कि दर्शकों का स्वाद बदल चुका है और मौजूदा दौर में इस तरह की प्रस्तुति को स्वीकार करना मुश्किल होगा।
रिव्यू में फिल्म को सिर्फ ⭐ 1 स्टार दिया गया है। हालांकि, ये टिप्पणियां एक दर्शक की व्यक्तिगत समीक्षा हैं और फिल्म की आधिकारिक या सार्वभौमिक आलोचनात्मक प्रतिक्रिया नहीं मानी जानी चाहिए।