टीवी के ‘कर्ण’ पंकज धीर नहीं रहे : एक ऐसा कलाकार जिसने मिथक को जीवंत कर दिया
मुंबई : टेलीविज़न के स्वर्ण युग में अपने दमदार अभिनय से अमर हुए अभिनेता पंकज धीर का निधन हो गया है। महाभारत में “कर्ण” के रूप में उनकी छवि आज भी दर्शकों के दिलों में अमिट है। पंकज धीर ने न केवल एक पात्र निभाया, बल्कि उस पात्र को ऐसा जीवन दिया कि लोग आज भी “कर्ण” कहते ही उनका चेहरा याद करते हैं।
मूल रूप से मुंबई में पले-बढ़े पंकज धीर की पृष्ठभूमि संस्कृत या तांत्रिक हिंदी से दूर रही थी। लेकिन जब महाभारत की शूटिंग शुरू हुई, तो उन्होंने एक समर्पित विद्यार्थी की तरह भाषा, भाव और पात्र—तीनों को आत्मसात कर लिया। दिलचस्प यह कि पर्दे पर न तो उनकी भाषा की झिझक दिखी, न ही भावों की कमी।
कर्ण का चरित्र जटिल था—अहंकार, पीड़ा, त्याग और प्रतिशोध से भरा हुआ। धीर ने इस चरित्र को इतनी बारीकी से निभाया कि दर्शक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ गए। जब कर्ण-वध का प्रसारण हुआ, तो छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के एक जनजातीय कस्बे में हिंसा भड़क उठी। कहा जाता है कि वहाँ के लोग कर्ण की पूजा करते हैं। स्थिति को संभालने के लिए सरकार को खुद पंकज धीर को हेलीकॉप्टर से वहाँ बुलाना पड़ा, ताकि वे अपने दर्शकों को समझा सकें कि “कर्ण” केवल एक अभिनय है, न कि वास्तविक मृत्यु।
टीवी जगत में कई कलाकारों को “टीवी का अमिताभ” कहा गया—मुकुल देव, रोनित रॉय या मुकेश खन्ना उनमें प्रमुख हैं—परंतु महाभारत के कर्ण के रूप में पंकज धीर का कद सबसे अलग था। उनके भीतर विजय की वह छाया थी—गंभीर, मौन, और भीतर से धधकती हुई। दिलचस्प यह कि जिस धनुष से कर्ण युद्ध करता था, उसका नाम भी “विजय” ही था।
कर्ण की सबसे बड़ी चाह थी—इतिहास में अमर हो जाना। और पंकज धीर ने उसे सच कर दिखाया।
आज जब वे इस दुनिया में नहीं रहे, तो टीवी स्क्रीन का वह मौन योद्धा एक युग छोड़ गया है—जहाँ अभिनय केवल संवाद नहीं था, बल्कि श्रद्धा और समर्पण की मूर्ति बन चुका था।
— श्रद्धांजलि : कर्ण अमर रहेंगे, क्योंकि पंकज धीर ने उन्हें अमर कर दिया।