भारत को आज भी ऊर्जा देते हैं स्वामी विवेकानंद: युवा शक्ति का अमर प्रतीक

 अमर शर्मा | TWM News 

भारत जब भी अपनी युवा शक्ति की बात करता है, तो स्वामी विवेकानंद का नाम स्वतः सामने आ जाता है। वह केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि एक ऐसी चेतना थे, जिसने भारत के आत्मविश्वास को वैश्विक मंच पर पुनः स्थापित किया। आज जब देश स्वामी विवेकानंद को स्मरण कर रहा है, तब यह स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है।

स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को सबसे पहले यह सिखाया कि आत्मविश्वास ही सबसे बड़ी साधना है। उनका प्रसिद्ध कथन — “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए” — आज भी करोड़ों युवाओं की नसों में ऊर्जा भर देता है। उन्होंने धर्म को कर्म से, और अध्यात्म को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा।

1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण केवल भारत का परिचय नहीं था, बल्कि पश्चिम को यह एहसास कराना था कि भारत ज्ञान, सहिष्णुता और मानवता की भूमि है। उस एक भाषण ने गुलामी की मानसिकता में जकड़े भारत को गर्व से खड़ा होने का साहस दिया।

आज का भारत तकनीक, स्टार्टअप और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में प्रवेश कर चुका है, लेकिन साथ ही युवाओं के सामने दिशाहीनता, तनाव और पहचान का संकट भी है। ऐसे समय में विवेकानंद का दर्शन हमें याद दिलाता है कि चरित्र निर्माण के बिना विकास अधूरा है। उन्होंने कहा था कि शिक्षा वही है, जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे।

स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं था, बल्कि मानवीय और समावेशी था। वह भारत को विश्वगुरु बनते देखना चाहते थे, लेकिन सेवा, त्याग और करुणा के रास्ते से। आज जब युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी ताकत है, तब विवेकानंद का विचार मार्गदर्शक बन सकता है।

भारत को विवेकानंद की केवल तस्वीरों और भाषणों में नहीं, बल्कि नीति, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। यदि आज का युवा आत्मविश्वासी, नैतिक और संवेदनशील बनता है, तो यही विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

स्वामी विवेकानंद स्मृति नहीं, संभावना हैं — एक ऐसा प्रकाश, जो हर पीढ़ी को नई दिशा देता रहेगा।

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