समुद्री जहाजों पर मंडराता इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का खतरा: जीपीएस से छेड़छाड़ बन रही वैश्विक नौवहन के लिए नई चुनौती
लेखक: अमर शर्मा (ओपिनियन)
आज के दौर में युद्ध केवल हथियारों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक तकनीक के साथ युद्ध का स्वरूप भी बदल रहा है। अब “इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर” यानी डिजिटल और साइबर हमले वैश्विक समुद्री परिवहन के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। खासकर युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जहाजों की नेविगेशन प्रणाली को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे न केवल व्यापार प्रभावित हो सकता है बल्कि जहाजों पर काम करने वाले नाविकों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।
दरअसल आधुनिक समुद्री जहाज अपनी स्थिति और दिशा निर्धारित करने के लिए मुख्य रूप से जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) पर निर्भर करते हैं। यदि इन सैटेलाइट संकेतों को बाधित कर दिया जाए या उनमें हेरफेर कर दी जाए, तो जहाज की नेविगेशन प्रणाली गलत स्थान दिखाने लगती है। ऐसी स्थिति में जहाज नक्शे पर कहीं और दिखाई देता है जबकि वास्तविकता में वह किसी और दिशा में बढ़ रहा होता है।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में दो प्रमुख तकनीकों का उपयोग किया जाता है—जीपीएस जैमिंग और जीपीएस स्पूफिंग। जैमिंग में असली सिग्नल को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शोर से दबा दिया जाता है, जिससे नेविगेशन सिस्टम सिग्नल प्राप्त ही नहीं कर पाता। वहीं स्पूफिंग अधिक खतरनाक होती है, जिसमें नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजकर जहाज को गलत दिशा में जाने के लिए भ्रमित किया जाता है।
हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें जहाजों की लोकेशन अचानक नक्शे पर असंभव जगहों पर दिखाई देने लगी—कभी समुद्र के बीच जहाज जमीन के भीतर दिखने लगे तो कभी गोल-गोल घूमते हुए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाएँ जीपीएस स्पूफिंग के कारण हो रही हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां भू-राजनीतिक तनाव ज्यादा है।
मई 2025 में लाल सागर में एक कंटेनर जहाज एमएससी एंटोनिया के साथ ऐसी ही घटना हुई। जहाज की नेविगेशन प्रणाली ने अचानक उसकी स्थिति सैकड़ों मील दूर दिखानी शुरू कर दी, जिससे चालक दल भ्रमित हो गया और अंततः जहाज समुद्र तट पर फंस गया। इस दुर्घटना से करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ और उसे निकालने में कई सप्ताह लग गए।
समस्या केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि मानव संसाधन से भी जुड़ी है। कई शोधों में यह सामने आया है कि समुद्री जहाजों के चालक दल को साइबर हमलों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। अधिकतर प्रशिक्षण ई-मेल या यूएसबी से जुड़े साइबर खतरों तक सीमित रहता है, जबकि जहाजों की वास्तविक चुनौती नेविगेशन और नियंत्रण प्रणालियों पर होने वाले डिजिटल हमले हैं।
इसके साथ ही पारंपरिक नौवहन तकनीकों का उपयोग भी कम होता जा रहा है। पहले नाविक कागजी नक्शों और खगोलीय नेविगेशन के आधार पर अपनी स्थिति का अनुमान लगा सकते थे, लेकिन अब अधिकांश जहाज पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर निर्भर हैं। यदि ये सिस्टम विफल हो जाएं या हैक हो जाएं, तो चालक दल के पास स्थिति की पुष्टि करने के सीमित विकल्प बचते हैं।
दूसरी ओर आधुनिक जहाज तेजी से इंटरनेट और सैटेलाइट कनेक्टिविटी से जुड़ते जा रहे हैं। इससे संचालन और संचार आसान होता है, लेकिन साथ ही साइबर हमलों के नए रास्ते भी खुल जाते हैं। जहाजों के इंजन, नेविगेशन और नियंत्रण प्रणालियों तक डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से पहुंच संभव हो जाती है।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री उद्योग को साइबर सुरक्षा के प्रति अधिक सतर्क होने की जरूरत है। जहाजों के चालक दल को उन्नत प्रशिक्षण देना, वैकल्पिक नेविगेशन तकनीकों को बनाए रखना और मजबूत डिजिटल सुरक्षा ढांचे का निर्माण करना समय की मांग बन गया है।
स्पष्ट है कि आने वाले समय में समुद्र के विशाल जलक्षेत्र केवल भौतिक युद्ध का मैदान नहीं होंगे, बल्कि डिजिटल संकेतों और साइबर तकनीकों का भी संघर्ष वहां देखने को मिलेगा। यदि समय रहते इस खतरे को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा दोनों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।