बेटी की मर्जी से विवाह करने पर परिवार ने किया उसका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार

गाँव में रीति-रिवाजों की जकड़न, सामाजिक मर्यादा के नाम पर बेटियों के अधिकारों का हनन

उत्तर दिनाजपुर। पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा गाँव में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया, जहाँ परिवार ने अपनी जिंदा बेटी का अंतिम संस्कार कर दिया। इसका कारण केवल इतना था कि उसने अपनी मर्जी से विवाह कर लिया था। परिजनों ने इसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर चोट मानते हुए उसे ‘मृत’ घोषित कर दिया और विधिवत संस्कार संपन्न किया।

घटना शनिवार की बताई जा रही है, जब लड़की के माता-पिता और रिश्तेदारों ने उसे परिवार से हमेशा के लिए अलग मानते हुए गंगा जल से अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं। गाँव के पुजारी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार किया गया, हवन संपन्न हुआ, और यहाँ तक कि गाँववालों के लिए भोज भी आयोजित किया गया, मानो किसी की वास्तविक मृत्यु हुई हो।

परिवार ने दर्ज कराई थी गुमशुदगी की रिपोर्ट

जानकारी के अनुसार, युवती ने 9 मार्च को अपने प्रेमी संग भागकर विवाह कर लिया था। इस पर उसके माता-पिता ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। बाद में पुलिस ने उसे ढूँढ निकाला और कानूनी रूप से यह पुष्टि की गई कि युवती बालिग है और उसे अपनी इच्छानुसार जीवन साथी चुनने का अधिकार है। हालाँकि, परिवार ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया और इस तरह के कठोर कदम उठाने का फैसला किया।

गाँव में समर्थन, समाजशास्त्रियों ने जताई चिंता

गाँव के कई लोगों ने परिवार के इस कदम का समर्थन किया और इसे सामाजिक परंपराओं की रक्षा के लिए आवश्यक बताया। स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि इससे गाँव की अन्य लड़कियों को चेतावनी मिलेगी कि वे भी परिवार की मर्जी के खिलाफ विवाह करने से बचें।

इस घटना पर समाजशास्त्री बिस्वजीत भट्टाचार्य ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “कानूनी अधिकारों के बावजूद, ग्रामीण समाज में सामाजिक बहिष्कार का भय अधिक प्रभावी रहता है। परिवार की इज्जत के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता को दबाना गहरी जड़ें जमा चुका है, और इसी मानसिकता के चलते ऐसी घटनाएँ होती हैं।”

विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच का परिचायक है, जहाँ बेटियों को सम्मान का प्रतीक समझा जाता है, लेकिन उनकी इच्छाओं और अधिकारों को परिवार की मर्यादा के नाम पर कुचल दिया जाता है।

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