ऑपरेशन सिंदूर के बाद वैश्विक मंच पर भारत की असली तस्वीर: कौन बने सच्चे साथी, कौन रह गए मौन
— टीडब्ल्यूएम न्यूज़ डेस्क
ऑपरेशन सिंदूर के बाद उभरे भू-राजनीतिक समीकरणों ने एक बार फिर दुनिया में भारत की स्थिति और उसके कूटनीतिक संबंधों की असलियत को उजागर कर दिया है। चार दिनों तक चले इस सैन्य संघर्ष के बाद अब समय आ गया है कि देश उन चेहरों को पहचाने जो संकट की घड़ी में साथ खड़े रहे — और उन देशों को भी, जिन्होंने तटस्थता की चादर ओढ़ ली।
IMF कर्ज़ और अमेरिकी भूमिका पर उठे सवाल
भारत के लिए सबसे चौंकाने वाली घटना रही पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा 1 अरब डॉलर का ऋण। भारत लंबे समय से IMF को यह चेतावनी देता रहा है कि पाकिस्तान इस धन का उपयोग आतंकवाद और सैन्य गतिविधियों में करता है, लेकिन इस चेतावनी को नजरअंदाज़ किया गया। भारत ने खुद इस मतदान में भाग नहीं लिया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि विदेश मंत्रालय को इसके खिलाफ कूटनीतिक स्तर पर सक्रियता दिखानी चाहिए थी।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि, “प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं में मित्रता की बातें करते हैं, लेकिन जब ऐसे मंचों पर पाकिस्तान को रोकने का मौका आता है, तो भारत की आवाज़ कमजोर पड़ जाती है।”
सऊदी और ईरान की कूटनीतिक पहल
इस बीच, भारत के साथ संबंधों को लेकर सऊदी अरब ने एक संतुलित रुख अपनाया। ऑपरेशन सिंदूर की समाप्ति के कुछ घंटों बाद ही सऊदी विदेश मंत्री अदेल अलजुबैर की अचानक भारत यात्रा और एस जयशंकर से मुलाकात ने कई संकेत दिए। इस यात्रा के साथ ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी दिल्ली पहुंचे और पाकिस्तान के साथ संवाद की वकालत की।
हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने चीन, सऊदी अरब और यूएई को “अभूतपूर्व समर्थन” देने के लिए धन्यवाद दिया, जो स्पष्ट रूप से भारत के लिए संकेत था कि इन देशों की प्राथमिकताएं कहाँ हैं।
निरपेक्ष देशों की लंबी कतार
अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जापान, कतर, यूएन — सभी ने शांति और बातचीत की बातें कीं, लेकिन किसी ने खुलकर भारत के पक्ष में खड़ा होने का साहस नहीं दिखाया। इन देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की, जिससे भारत की जनता और राजनीतिक हलकों में नाराज़गी देखी गई।
तुर्की और अजरबैजान का खुला समर्थन पाकिस्तान को
तुर्की और अजरबैजान ने इस बार भी पाकिस्तान का पक्ष लिया। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने शाहबाज शरीफ को “प्रिय भाई” कह कर समर्थन दोहराया। वहीं, अजरबैजान ने पहले तो कश्मीर पर चुप्पी साधी, लेकिन बाद में ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की बातों को दोहराते हुए भारत की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए।
इज़राइल और रूस ने जताया भारत को समर्थन
भारत के लिए संतोषजनक रहा इज़राइल और रूस का रुख। इज़राइल के भारत स्थित राजदूत रूवेन अज़र ने बयान जारी कर कहा, “भारत को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है। आतंकवादियों को उनके अपराधों की कीमत चुकानी होगी।” वहीं रूस ने भी भारत को “पूरा समर्थन” देने की बात दोहराई।
अमेरिका की तटस्थता बनी चर्चा का विषय
अमेरिका की भूमिका को लेकर देश में सबसे अधिक बहस छिड़ी हुई है। न तो उसने पाकिस्तान को ऋण देने में कोई विरोध जताया, न ही भारत के साथ स्पष्ट रूप से खड़ा हुआ। कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान को एक बराबरी पर खड़ा कर दिया, जिससे मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठे हैं।
ऑपरेशन सिंदूर ने केवल एक सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक परीक्षा भी दी है। इस संघर्ष ने भारत को ये स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक मंच पर मित्रता केवल कंधे पर हाथ रखने से नहीं, बल्कि संसाधनों, वोट और स्पष्ट समर्थन से परखी जाती है। अब वक्त आ गया है कि भारत अपने “वास्तविक मित्रों” को पहचाने और अपनी विदेश नीति को नई दिशा दे।
— रिपोर्ट: निहाल कुमार दत्ता, एडिटर, TWM न्यूज़