नक्सलवाद को करारा झटका: शीर्ष माओवादी नेता बसवराजु मुठभेड़ में ढेर, आंदोलन की वापसी अब असंभव
छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जंगलों में सुरक्षा बलों का बड़ा ऑपरेशन, मारे गए 27 नक्सली

रायपुर –  देश के सबसे बड़े आंतरिक सुरक्षा खतरे माने जाने वाले नक्सलवाद को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब माओवादी संगठन के शीर्ष नेता और महासचिव नंबल्ला केसवा राव उर्फ बसवराजु को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में मार गिराया। उनके साथ 26 अन्य नक्सली भी ढेर हो गए। इस कार्रवाई को नक्सली आंदोलन के अंत की शुरुआत माना जा रहा है।

70 वर्षीय बसवराजु माओवादी संगठन के महासचिव थे—यह पद संगठन में सबसे उच्च माना जाता है। उन्होंने वर्ष 2018 में मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति के स्थान पर यह जिम्मेदारी संभाली थी। इससे पहले वे केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) के प्रमुख थे, जो माओवादियों की सैन्य शाखा मानी जाती है।

इंजीनियर से बना खूंखार गुरिल्ला नेता
आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले से आने वाले बसवराजु ने वारंगल स्थित रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (अब NIT) से बीटेक किया था। 1980 में छात्र जीवन से ही वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े और 1985 में भूमिगत हो गए। उन्होंने पीपुल्स वार ग्रुप से शुरुआत की, जो बाद में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर से मिलकर 2004 में सीपीआई (माओवादी) बना।

उनके सिर पर 1.50 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और वे कई बड़े हमलों के मास्टरमाइंड रहे हैं—जिनमें 2010 का दंतेवाड़ा हमला शामिल है, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे, 2013 का जीरम घाटी हमला जिसमें पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा सहित 27 लोग मारे गए थे, और 2018 में आंध्र प्रदेश के विधायक किदारी सर्वेश्वर राव की हत्या प्रमुख है।

आंदोलन की कमर टूटी, समर्थन भी खत्म
पिछले कुछ वर्षों से माओवादी आंदोलन लगातार कमजोर पड़ता गया है। युवाओं, छात्रों, महिलाओं और ग्रामीण तबकों में संगठन की पकड़ ढीली पड़ी है। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव, बेहतर संचार नेटवर्क और संगठित रणनीति के चलते सैकड़ों नक्सली मारे गए हैं और सैकड़ों ने आत्मसमर्पण किया है।

विशेष रूप से छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमा से लगे जंगलों में ऑपरेशन लगातार तेज हुए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद को जड़ से खत्म करने का संकल्प दोहराया है।

तेलंगाना का गढ़ अब खाली
कभी तेलंगाना को नक्सल आंदोलन का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब वहाँ संगठन का असर न के बराबर रह गया है। आंदोलन का वह ‘आकर्षण’ जो कभी शहरी युवाओं और ग्रामीण शोषित वर्गों को आकर्षित करता था, वह खत्म हो चुका है। अब यह आंदोलन केवल फिरौती, बंदूक की ताकत और विकास विरोधी गतिविधियों का पर्याय बन गया है।

‘आंध्र मॉडल’ बना उदाहरण
आंध्र प्रदेश ने नक्सलवाद से निपटने के लिए ‘ग्रेहाउंड्स’ नामक एक विशेष बल का गठन किया, जो जंगल युद्ध और सटीक खुफिया आधारित ऑपरेशन में माहिर है। साथ ही राज्य सरकार ने दोहरी रणनीति अपनाई—सुरक्षा बलों को सशक्त बनाना और आदिवासी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना। यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बना।

नए भारत में नक्सल विचारधारा के लिए जगह नहीं
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा और बंदूक के बल पर सत्ता हासिल करने की माओवादी सोच का कोई स्थान नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी विकास के साथ-साथ जनसरोकार की योजनाएं लागू करे, ताकि जनता का विश्वास राज्य में बना रहे और कोई भी संगठन भ्रम फैलाकर उन्हें बहकाने में सफल न हो।

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह समय है कि वे इस निर्णायक जीत को स्थायी सफलता में बदलें। इसके लिए सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ जनता से संवाद, विकास और विश्वास की नीति को भी उतनी ही गंभीरता से अपनाना होगा।

 

अमर शर्मा

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