कानूनी सहायता शिविरों और राहत सामग्री वितरण का होगा उद्घाटन
नई दिल्ली। मणिपुर में पिछले वर्ष हुई हिंसा के बाद राहत और पुनर्वास प्रयासों की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल शनिवार को इम्फाल के लिए रवाना हुआ। दल का नेतृत्व जस्टिस बी आर गवई कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।
इस दौरे में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, एम एम सुंदरश, के वी विश्वनाथन और एन कोटिश्वर शामिल हैं। यह टीम मणिपुर में हिंसा प्रभावित आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की स्थिति का जायजा लेगी और उन्हें कानूनी व मानवीय सहायता प्रदान करेगी।
कानूनी और चिकित्सा शिविरों का उद्घाटन
दौरे के दौरान जस्टिस गवई मणिपुर के विभिन्न जिलों में कानूनी सेवा और चिकित्सा शिविरों का वर्चुअल उद्घाटन करेंगे। इसके अलावा, इम्फाल पूर्व, इम्फाल पश्चिम और उखरुल जिलों में नए कानूनी सहायता केंद्र भी खोले जाएंगे।
इन शिविरों में प्रभावित लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी जाएगी, जिनमें स्वास्थ्य सेवाएं, पेंशन लाभ, रोजगार के अवसर और पहचान दस्तावेजों का पुनर्निर्माण शामिल है। साथ ही, विस्थापित व्यक्तियों को आवश्यक राहत सामग्री भी वितरित की जाएगी।
राष्ट्रपति शासन में देरी पर कांग्रेस का सवाल
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि छह न्यायाधीशों का मणिपुर दौरा राहत प्रयासों को मजबूती देगा, लेकिन साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति शासन लागू करने में देरी को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए।
रमेश ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में मणिपुर में संवैधानिक व्यवस्था के पूरी तरह चरमरा जाने की बात कही थी। इसके बावजूद सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करने में 18-19 महीने क्यों लग गए? छह महीने तक राज्य में पूर्णकालिक राज्यपाल भी नहीं था। पहले एक आदिवासी महिला राज्यपाल को हटा दिया गया और असम के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार दिया गया। इसके बाद एक सेवानिवृत्त नौकरशाह को राज्यपाल नियुक्त किया गया। आखिर इतनी देरी क्यों हुई?”
गौरतलब है कि 3 मई 2023 को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर (ATSUM) की रैली के बाद हिंदू मैतेई और ईसाई कुकी समुदायों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं। इसके बाद राज्य में हालात काबू करने के लिए केंद्र सरकार को अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी थी।