‘वेलकम टू द जंगल’: नॉस्टैल्जिया का शोर, कहानी का कमजोर दौर

सितारों की भीड़ में खो गई कहानी, हंसी के नाम पर बिखरे ‘व्हाट्सएप’ जोक्स

अनिरुद्ध नारायण (इंटर्न), संपादन: निहाल कुमार दत्ता

पटना:
कॉमेडी फिल्मों के नाम पर आजकल जिस तरह का कंटेंट परोसा जा रहा है, उसी कड़ी में ‘वेलकम टू द जंगल’ भी एक नया प्रयोग बनकर सामने आती है। अगर नॉस्टैल्जिया को भुनाना एक कला है, तो यह फिल्म उस कला की चरम सीमा पर नजर आती है। फिल्म में ‘वेलकम’, ‘फिर हेरा फेरी’, ‘आवारा पागल दीवाना’ और ‘ढूंढते रह जाओगे’ जैसी फिल्मों का मिला-जुला प्रभाव दिखता है, जिसमें ‘बॉर्डर’, ‘महाभारत’ और ‘तीस मार खान’ का तड़का भी शामिल है।

कहानी (प्लॉट):
फिल्म की कहानी एक फिल्म के भीतर फिल्म की है, जहां एक संदिग्ध बिजनेसमैन टैक्स से बचने के लिए जानबूझकर एक फ्लॉप फिल्म बनाना चाहता है। इसके लिए वह फ्लॉप एक्टर्स और डायरेक्टर्स को चुनता है। शूटिंग के लिए टीम एक गांव पहुंचती है, जहां वे आतंकवादियों और ग्रामीणों के बीच संघर्ष में फंस जाते हैं।

लेखन और स्क्रीनप्ले:
फिल्म की शुरुआत कुछ हद तक मनोरंजक लगती है, जिसमें सेल्फ-अवेयर जोक्स और मेटा रेफरेंस दर्शकों को बांधने की कोशिश करते हैं। हालांकि, यह हंसी केवल ‘टुकड़ों में’ ही असर करती है। धीरे-धीरे जोक्स दोहराव का शिकार हो जाते हैं और ‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ जैसी सतही कॉमेडी में बदल जाते हैं।
दूसरे हिस्से में कहानी पूरी तरह बिखर जाती है, जहां घटनाएं ‘कुछ भी’ की श्रेणी में आने लगती हैं। भावनात्मक दृश्यों का असर भी अधूरा रह जाता है और दर्शक कहानी से जुड़ नहीं पाते।

अभिनय (परफॉर्मेंस):
फिल्म की स्टार कास्ट बेहद बड़ी है, लेकिन कोई भी किरदार खास याद नहीं रह पाता। अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, जॉनी लीवर, परेश रावल, राजपाल यादव और अरशद वारसी अपने अनुभव से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं।
रवीना टंडन सीमित भूमिका में प्रभाव छोड़ती हैं, जबकि जैकी श्रॉफ का किरदार पूरी तरह बेकार जाता है। दिशा पटानी और जैकलीन फर्नांडिस केवल ग्लैमर तक सीमित नजर आती हैं।

तकनीकी पक्ष और संगीत:
लोकेशन में प्रामाणिकता की कमी दिखती है और एक्शन सीन भी प्रभाव छोड़ने में असफल रहते हैं। कुछ दृश्य एआई जनरेटेड प्रतीत होते हैं, जो अनुभव को और कमजोर करते हैं। फिल्म का संगीत भी खास प्रभाव नहीं छोड़ पाता।

‘वेलकम टू द जंगल’ एक दिलचस्प आइडिया के बावजूद कमजोर निर्देशन और ढीले संवादों के कारण बिखर जाती है। हर सीन एक नए ‘लो पॉइंट’ की तरह सामने आता है। यह फिल्म भले ही मौजूदा कॉमेडी फिल्मों से थोड़ी बेहतर लगे, लेकिन यह कोई खास उपलब्धि नहीं कही जा सकती।
कुल मिलाकर, यह फिल्म एक ऐसा अनुभव है जिसे दर्शक जल्दी भूलना चाहेंगे।

रेटिंग: ⭐⭐✨ (2.5/5)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *