झारखंड राज्यसभा चुनाव में नया मोड़: परिमल नाथवाणी की एंट्री से सियासी समीकरण उलझे
निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे नाथवाणी, INDIA गठबंधन और विपक्ष दोनों के लिए बढ़ी चुनौती
अनिरुद्ध नारायण, इंटर्न
रांची, 8 जून:
झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव ने उस वक्त नया मोड़ ले लिया जब पूर्व राज्यसभा सांसद और उद्योगपति परिमल नाथवाणी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन प्रक्रिया में भाग लेकर सियासी समीकरणों को और जटिल बना दिया।
राज्य की दो सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में पहले से ही कई बड़े नाम मैदान में हैं, लेकिन नाथवाणी की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके आने से चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है।
मुकाबला हुआ बहुकोणीय
अब तक इस चुनाव के लिए कुल छह उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र खरीदे हैं, जिनमें कांग्रेस के प्रणव झा, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के बैद्यनाथ राम, भाजपा के गौरव वल्लभ, निर्दलीय परिमल नाथवाणी, वाईएसआर कांग्रेस के वी. विजयसाय रेड्डी और एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं।
नाथवाणी, जो पहले झारखंड से दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं, एक बार फिर राज्य की राजनीति में सक्रिय होते दिख रहे हैं, जिससे चुनाव का रोमांच बढ़ गया है।
गठबंधन में भी दिख रही खींचतान
इस चुनाव ने सत्तारूढ़ INDIA गठबंधन के भीतर भी मतभेदों को उजागर कर दिया है। कांग्रेस और JMM के बीच उम्मीदवार चयन को लेकर असहमति सामने आई है, जिससे राजनीतिक स्थिति और पेचीदा हो गई है।
हालांकि, दोनों दलों ने बाद में एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, लेकिन नाथवाणी जैसे उम्मीदवार की मौजूदगी से परिणाम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
चुनावी गणित पर असर
झारखंड विधानसभा में INDIA गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है, लेकिन अतिरिक्त उम्मीदवारों की एंट्री और संभावित क्रॉस-वोटिंग की आशंका ने इस चुनाव को हाई-स्टेक मुकाबला बना दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नाथवाणी को विभिन्न दलों के विधायकों के साथ अच्छे संबंधों का फायदा मिल सकता है, जिससे मुकाबला और कड़ा हो सकता है।
आगे क्या?
नामांकन प्रक्रिया के अंतिम चरण के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अंतिम समय में कौन किसके समर्थन में आता है और चुनावी समीकरण किस ओर करवट लेते हैं।
झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव अब केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि गठबंधन की मजबूती और राजनीतिक रणनीति की परीक्षा बन गया है।