झारखंड के 4 पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग, हस्तशिल्प और सिल्क उद्योग को नई पहचान
अनिरुद्ध नारायण (इंटर्न)
रांची:
झारखंड की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। राज्य के चार प्रमुख उत्पाद भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और बांस शिल्प को प्रतिष्ठित जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि राज्य की सांस्कृतिक विरासत और कारीगरों के कौशल को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
इस उपलब्धि में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नाबार्ड ने उत्पादों की विशेषताओं की पहचान, दस्तावेज़ीकरण, कारीगरों को संगठित करने और GI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरा कराने में सहयोग किया।
विशेषज्ञों के अनुसार, GI टैग मिलने से इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जिससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और असली कारीगरों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलेगा। इसके साथ ही इन उत्पादों की ब्रांडिंग, निर्यात और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
मुंडा ज्वेलरी जहां आदिवासी संस्कृति की पहचान है, वहीं भगैया और कुचाई सिल्क झारखंड की समृद्ध रेशम परंपरा को दर्शाते हैं। बांस शिल्प ग्रामीण कारीगरों की रचनात्मकता और स्थानीय संसाधनों के उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
नाबार्ड के अधिकारियों का कहना है कि यह पहल न केवल पारंपरिक कला को संरक्षित करेगी, बल्कि नई पीढ़ी को भी इन शिल्पों से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी। साथ ही, इससे राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की संभावना है।