‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ मनोरंजन से भरपूर, लेकिन पहले दो भागों की बराबरी नहीं
TWM News | मनोरंजन डेस्क
फिल्मों ने हमें एक बात जरूर सिखाई है कि किसी चीज का वास्तविक होना जरूरी नहीं, बस उसका वास्तविक लगना जरूरी है। ‘दृश्यम’ की दुनिया में विजय सालगांवकर का एक मशहूर संवाद था—“शब्द झूठे हो सकते हैं, लेकिन दृश्य नहीं।” हालांकि ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ को देखने के बाद यह संवाद भी कुछ हद तक उल्टा साबित होता नजर आता है।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘दृश्यम 3’ एक मौलिक कहानी है और मलयालम मूल फिल्म का रीमेक नहीं है। फिल्म देखने के दौरान कहानी में कई ऐसे मोड़ आते हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं। हालांकि कई घटनाओं और ट्विस्ट का अनुमान पहले ही लगाया जा सकता है, बावजूद इसके फिल्म मनोरंजन बनाए रखने में सफल रहती है।
जयदीप अहलावत ने मारी बाजी
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत अगर किसी एक कलाकार को कहा जाए तो वह जयदीप अहलावत हैं। उन्होंने अपने अभिनय से फिल्म पर पूरी तरह पकड़ बना ली है। कई दृश्यों में वह अजय देवगन पर भी भारी पड़ते नजर आते हैं।
खास तौर पर पहले भाग में जयदीप अहलावत और गायतोंडे की भूमिका में कमलेश सावंत के बीच के हिस्से प्रभावी हैं। दोनों कलाकारों की मौजूदगी फिल्म के शुरुआती हिस्से को मजबूत बनाती है।
वहीं अजय देवगन के हिस्से में अपेक्षाकृत कम संवाद हैं, लेकिन वह अपने हाव-भाव और आंखों के जरिए किरदार को प्रभावी बनाते हैं। शांत, संयमित और रहस्यमयी विजय सालगांवकर के रूप में अजय एक बार फिर अपने किरदार में सहज नजर आते हैं।
बाकी कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।
कहानी और स्क्रीनप्ले
कहानी पहले के मुकाबले अलग रास्ता अपनाती है और विजय सालगांवकर तथा पुलिस के बीच चलने वाले कैट-एंड-माउस गेम पर ज्यादा जोर देती है। पहला भाग थोड़ा धीमा जरूर है, लेकिन लंबे समय तक बोरियत महसूस नहीं होती।
गायतोंडे के हिस्से कहानी में मनोरंजन जोड़ते हैं। कॉमेडी वाले दृश्य भी अधिकांश जगहों पर प्रभावी हैं। वहीं जयदीप अहलावत और अजय देवगन के बीच टकराव फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल है।
फिल्म का सबसे दिलचस्प सवाल यही रहता है कि आखिर पुलिस विजय सालगांवकर तक पहुंचेगी कैसे?
हालांकि दूसरे भाग में फिल्म थोड़ी अपनी रफ्तार खोती है। कई ट्विस्ट का अनुमान पहले ही लगाया जा सकता है। अंतिम ट्विस्ट कुछ हद तक चौंकाता है, लेकिन फिल्म में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं जहां दर्शक वास्तव में कहे—“यह तो सोचा ही नहीं था।”
इसके बावजूद इसकी प्रेडिक्टेबिलिटी फिल्म के मनोरंजन को पूरी तरह खत्म नहीं करती।
परिवार का भावनात्मक पक्ष थोड़ा कमजोर
फिल्म की सबसे बड़ी कमी कहानी से ज्यादा उसके भावनात्मक पक्ष में नजर आती है।
‘दृश्यम’ की पहली दो फिल्मों की ताकत सिर्फ यह नहीं थी कि विजय पुलिस से ज्यादा चालाक था। असली जुड़ाव इस बात से था कि एक पिता अपने परिवार को बचाने के लिए किस हद तक जाने को तैयार है।
‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ में परिवार कहानी के केंद्र में पहले जितना मजबूत महसूस नहीं होता। यहां कहानी का फोकस विजय की एक और चाल और पुलिस से बच निकलने की कोशिश पर ज्यादा है।
निर्देशन
निर्देशक अभिषेक पाठक ने फ्रेंचाइजी की मूल भावना को समझते हुए एक ऐसा निष्कर्ष देने की कोशिश की है जो कहानी को आगे बढ़ाता है। फिल्म को सिर्फ सीक्वल बनाने के लिए खींचने के बजाय इसे एक उचित निष्कर्ष देने की कोशिश नजर आती है।
अंतिम फैसला
क्या ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ पहले दो भागों जितनी मजबूत है? नहीं।
क्या यह मनोरंजन करती है? बिल्कुल।
फिल्म में मजबूत अभिनय, खासकर जयदीप अहलावत का शानदार प्रदर्शन, प्रभावी टकराव और पर्याप्त सस्पेंस मौजूद है। कुछ ट्विस्ट भले ही अनुमानित हों, लेकिन फिल्म ज्यादातर समय दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहती है।
कुल मिलाकर ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ एक प्रतिष्ठित फ्रेंचाइजी का मनोरंजक और संतोषजनक निष्कर्ष है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5
बॉक्स ऑफिस की बात करें तो फिल्म में बड़े दर्शक वर्ग को आकर्षित करने की क्षमता नजर आती है। अगर दर्शकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रहती है, तो यह अजय देवगन की बड़ी व्यावसायिक सफल फिल्मों में शामिल हो सकती है।