‘द वैन’ रिव्यू: कम बजट की ‘कांतारा’ बनने की कोशिश, कहानी में दम लेकिन कमजोर एक्जीक्यूशन ने बिगाड़ा खेल

पटना। ‘द वैन’ को देखकर सबसे पहली बात जो दिमाग में आती है, वह है—क्या यह हिंदी बेल्ट की ‘कांतारा’ बनने की कोशिश है? फिल्म भारतीय लोककथाओं, पौराणिक संदर्भों, रहस्य, सुपरनैचुरल एलिमेंट, एक्शन, कॉमेडी और थ्रिलर को एक साथ मिलाने की कोशिश करती है। फिल्म में एक अच्छी कहानी की संभावना साफ नजर आती है, लेकिन कमजोर एक्जीक्यूशन उस संभावना को पूरी तरह उभरने नहीं देता।

कहानी में संभावनाएं, लेकिन शुरुआत कमजोर

फिल्म का छठ पूजा का चित्रण प्रभावित करता है। बैकस्टोरी भी शुरुआत में उत्सुकता पैदा करती है और कुछ मेटा-जोक्स वास्तव में अच्छे हैं। सुनील ग्रोवर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। खासकर फिल्म का दूसरा भाग पहले हिस्से की तुलना में काफी बेहतर है। क्लाइमेक्स और बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को आखिर में संभालने की कोशिश करते हैं।

लेकिन पहला हाफ फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। यहां कहानी से ज्यादा विज्ञापन, गाने, ग्रीन स्क्रीन और टीवी सीरियल जैसी प्रस्तुति नजर आती है।

फिल्म या विज्ञापनों का शो?

फिल्म में ब्रांड इंटीग्रेशन जरूरत से ज्यादा दिखाई देता है। Fortune, Fortune Rice और GasoFast जैसे ब्रांड्स के विज्ञापन कहानी के बीच इतने स्पष्ट नजर आते हैं कि कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म देख रहे हैं या ब्रांड इंटीग्रेशन वाला कोई यूट्यूब शो।

जंगल के दृश्य भी काफी बनावटी लगते हैं। कुछ विजुअल्स में ऐसा एहसास होता है जैसे उन्हें बेहतर तरीके से तैयार करने की जरूरत थी। कई दृश्य टीवी सीरियल वाली प्रस्तुति का अहसास कराते हैं।

पौराणिक कहानी भी नहीं बना पाती मजबूत पकड़

फिल्म का पौराणिक पक्ष भी उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता, जितनी उम्मीद की जाती है। कहानी में रहस्य और रोमांच पैदा करने के बजाय कई जगह पौराणिक संदर्भ जबरदस्ती जोड़े हुए महसूस होते हैं। फिल्म खत्म होने तक दर्शक के मन में कई सवालों के साथ यही भाव रह जाता है—आखिर यह सब हुआ क्या?

जबरन डाली गई कॉमेडी ने बिगाड़ा फ्लो

मनीष पॉल और सुलभा आर्या से जुड़ा कॉमेडी ट्रैक फिल्म की मुख्य कहानी से अलग-थलग महसूस होता है। कॉमेडी कई जगह जरूरत से ज्यादा बचकानी लगती है और फिल्म के गंभीर माहौल को बार-बार तोड़ देती है। इससे कहानी की गति प्रभावित होती है।

हर गंभीर सीन के बाद गाना!

फिल्म में गानों का इस्तेमाल भी खटकता है। गंभीर बातचीत चल रही है—अचानक गाना। कहानी आगे बढ़ रही है—फिर गाना। बिहार के शिवपुर को अचानक मुंबई के किसी कन्वेंशन सेंटर की तरह डीजे लाइट्स और बड़े सेटअप के साथ दिखाया जाता है और फिर नायक कपड़े बदलकर डांस नंबर में पहुंच जाता है।

यह सब फिल्म की कहानी और माहौल के साथ सहज तरीके से जुड़ नहीं पाता।

‘दिव्य आवाज’ भी नहीं बना पाई प्रभाव

फिल्म में इस्तेमाल की गई दिव्य आवाज भी प्रभावशाली नहीं लगती। आवाज में उस रहस्यमय या अलौकिक उपस्थिति का एहसास नहीं आता, जिसकी कहानी को जरूरत थी। यह कई जगह सिर्फ माइक्रोफोन पर पढ़े जा रहे संवाद जैसी लगती है।

फिल्म के लोकेशन और प्रोडक्शन डिजाइन भी बिहार के माहौल को पूरी तरह विश्वसनीय बनाने में सफल नहीं होते।

सिद्धार्थ मल्होत्रा की कास्टिंग सवालों के घेरे में

सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक नजर आते हैं। उनके किरदार को जिस तरह की मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस की जरूरत थी, वह यहां दिखाई नहीं देती। कई दृश्यों में उनके एक्सप्रेशन सीमित नजर आते हैं, जिससे किरदार में अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं हो पाता।

तमन्ना भाटिया अपना काम करने की कोशिश करती हैं, लेकिन उनका किरदार भी कई जगह एकरस लगता है। श्वेता तिवारी के किरदार को पर्याप्त गहराई नहीं दी गई है। अनूप सोनी ठीक हैं, लेकिन बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ते।

वहीं सुनील ग्रोवर फिल्म के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में नजर आते हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और परफॉर्मेंस फिल्म में अलग असर पैदा करती है।

VFX भी मिला-जुला अनुभव

फिल्म के VFX की गुणवत्ता भी असमान है। कुछ लाइव-एक्शन CGI शॉट्स काफी कृत्रिम नजर आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के कुछ एनिमेशन सीक्वेंस लाइव-एक्शन CGI की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली लगते हैं।

निष्कर्ष

‘द वैन’ में एक अच्छी फिल्म बनने की संभावना थी और इसका दूसरा भाग यह साबित भी करता है। लेकिन कमजोर लेखन, असंगत एक्जीक्यूशन, जरूरत से ज्यादा ब्रांड इंटीग्रेशन, अनावश्यक गाने, बनावटी लगने वाले विजुअल्स, कमजोर कॉमेडी, सपाट पौराणिक प्रस्तुति और मुख्य किरदार की कास्टिंग फिल्म को लगातार कमजोर करते हैं।

फिल्म मिथक और हास्य को एक साथ साधने की कोशिश करती है, लेकिन दोनों ही मोर्चों पर पूरी तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाती।

सबसे बड़ी निराशा यही है कि कहानी में संभावना थी, लेकिन उसे पर्दे पर पूरी क्षमता के साथ उतारा नहीं जा सका।

अगर मुख्य किरदार के लिए अलग अभिनेता चुना जाता, लेखन को थोड़ा कसा जाता, गैर-जरूरी गानों और विज्ञापन इंटीग्रेशन को कम किया जाता और बिहार के वातावरण को अधिक वास्तविक तरीके से प्रस्तुत किया जाता, तो ‘द वैन’ का अनुभव काफी अलग हो सकता था।

रेटिंग: ⭐⭐½/5

क्या आपने ‘द वैन’ देखी है? फिल्म को लेकर आपकी क्या राय है?

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