पुराना टिकट : जब सिनेमा शहर की धड़कन हुआ करता था

एक दौर था, जब फिल्में केवल पर्दे पर नहीं चलती थीं, बल्कि शहर की गलियों, चौराहों और लोगों की बातचीत में भी जिंदा रहती थीं। कटिहार जैसे शहरों में सिनेमा मनोरंजन भर नहीं था, वह सामाजिक जीवन का हिस्सा था। फिल्म लगने से कई दिन पहले ही उसका माहौल बन जाता था।

बड़े-बड़े हाथ से बने पोस्टर, दीवारों पर रंगों से लिखे फिल्म के नाम और रिक्शे पर लगे लाउडस्पीकर से होता प्रचार उस दौर की पहचान थे। कंप्यूटर और डिजिटल प्रिंटिंग से पहले पेंटर ब्रश और रंगों से ही कपड़े के पोस्टर तैयार करते थे। अमिताभ बच्चन की आंखों में गुस्सा, मिथुन चक्रवर्ती के हाथ में रिवॉल्वर, श्रीदेवी की अदाएं और अमरीश पुरी का खौफनाक चेहरा—पोस्टर ही फिल्म की पहली झलक हुआ करते थे।

रिक्शे पर लाउडस्पीकर बजता था—“जी हां… मिथुन के साथ श्रीदेवी… मारधाड़ और एक्शन से भरपूर…”। फिल्म का प्रचार सुनकर मोहल्ले के बच्चे रिक्शे के पीछे दौड़ते और रास्ते में गिरती रंगीन पर्चियां बटोरते। आज के डिजिटल ट्रेलर और सोशल मीडिया प्रचार के दौर में यह दृश्य शायद अविश्वसनीय लगे, लेकिन कभी यही फिल्म प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम था।

टिकट की लाइन भी एक अनुभव थी

सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल के बाहर टिकट की कतार अपने आप में एक उत्सव हुआ करती थी। टिकट मिल जाना किसी उपलब्धि से कम नहीं था। कई बार ब्लैक में टिकट लेने की मजबूरी भी होती थी। फिल्म हिट हो जाए तो हफ्तों तक उसकी चर्चा चलती। ‘सिल्वर जुबली’ और ‘गोल्डन जुबली’ जैसे शब्द केवल प्रचार नहीं, प्रतिष्ठा का विषय हुआ करते थे।

फिल्म देखकर लौटे व्यक्ति की मोहल्ले में अलग हैसियत होती थी। अगले दिन वह फिल्म का चलता-फिरता समीक्षक बन जाता। कौन-सा दृश्य शानदार था, किस अभिनेता ने बेहतर अभिनय किया और कौन-सा संवाद याद रह गया—इन चर्चाओं में पूरा मोहल्ला शामिल हो जाता।

उस दौर में सिनेमा हॉल के बाहर होने वाली चर्चाएं आज के सोशल मीडिया जैसी थीं। फर्क इतना था कि तब न मोबाइल था, न इंटरनेट और न डेटा पैक। फिर भी खबर और राय पूरे मोहल्ले में तेजी से पहुंच जाती थी।

सिनेमा और कटिहार की स्मृतियां

कटिहार के कई सिनेमा हॉल अब बंद हो चुके हैं। कभी जिन जगहों पर फिल्म देखने के लिए भीड़ उमड़ती थी, वहां आज खामोशी है। लेकिन इन हॉलों से जुड़ी यादें अभी भी शहर के पुराने फिल्मप्रेमियों के मन में जीवित हैं।

किसी पुराने सिनेमा हॉल के सामने आज भी चिनिया-बादाम बेचता ठेला दिखाई दे जाए तो वह केवल एक ठेला नहीं लगता। वह बीते दौर की स्मृति जैसा महसूस होता है। वही जगह, वही सड़क, लेकिन वह सिनेमा नहीं रहा।

पुराने फिल्मप्रेमियों के लिए यह बदलाव केवल मनोरंजन के माध्यम के बदलने की कहानी नहीं है। यह शहर के सामाजिक जीवन में आए बदलाव की कहानी भी है।

ओटीटी ने बदला फिल्म देखने का तरीका

आज फिल्मों तक पहुंच पहले से कहीं आसान है। ओटीटी प्लेटफॉर्म और मोबाइल स्क्रीन ने सिनेमा को घर-घर पहुंचा दिया है। किसी फिल्म के लिए टिकट की लाइन में लगने या शो का इंतजार करने की जरूरत नहीं। जब चाहें, जहां चाहें, फिल्म देख सकते हैं।

लेकिन इस सुविधा के साथ फिल्म देखने का सामूहिक रोमांच कहीं कम जरूर हुआ है।

पहले फिल्म देखने के लिए पूरा परिवार तैयार होता था। दोस्त साथ जाते थे। रास्ते में फिल्म की चर्चा होती थी। इंटरवल में चाय-समोसे का दौर चलता था और फिल्म खत्म होने के बाद घर लौटते समय कहानी पर बहस होती थी।

अब फिल्म अक्सर अकेले मोबाइल या टीवी स्क्रीन पर देखी जाती है।

पहले फिल्म ‘लगती’ थी, अब वह स्क्रीन पर ‘उपलब्ध’ होती है।

पहले ‘फर्स्ट डे, फर्स्ट शो’ का इंतजार होता था, अब सवाल होता है—“समय मिले तो देख लेंगे।”

पुराने टिकट की कीमत

किसी पुराने बटुए, किताब या संदूक से मिला फिल्म का टिकट आज भले ही बेकार कागज लगे, लेकिन उसके मालिक के लिए वह एक पूरी कहानी हो सकता है। उस टिकट पर दर्ज तारीख किसी फिल्म की नहीं, एक दौर की तारीख होती है।

उसमें दोस्तों के साथ बिताई शाम, सिनेमा हॉल की सीट, इंटरवल का नाश्ता, फिल्म के संवाद और घर लौटने की यादें छिपी होती हैं।

इसलिए पुराने टिकट संभालकर रखना महज भावुकता नहीं है। यह अपने शहर और अपने समय की स्मृतियों को बचाकर रखने का एक तरीका भी है।

कटिहार के बंद हो चुके सिनेमा हॉल आज भले ही फिल्में न दिखाते हों, लेकिन उन्होंने शहर की कई पीढ़ियों की यादों में अपनी जगह बना ली है।

सिनेमा का वह दौर समाप्त जरूर हुआ है, लेकिन उसकी यादों की फिल्म आज भी चल रही है।

शायद इसी वजह से पुराना टिकट फेंकने का मन नहीं करता।

 

एक पुराना टिकट संभालकर रखने वाला फिल्मप्रेमी

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