“1978 की जासूसी की दास्तां, आज के संकट का रहस्य”: जियो-हॉटस्टार स्पेशल ‘सलाहकार’ पर एक नजर
✍️ निहाल दत्ता
(TWM News)

भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु होड़ और खुफिया जासूसी की पेचीदा दुनिया को लेकर बनी जियो-हॉटस्टार की नई वेब सीरीज “सलाहकार” इन दिनों चर्चा में है। महज पांच एपिसोड में फैली यह कहानी 1978 और 2025 – दो समयकालों के बीच झूलती है और उस ऐतिहासिक दौर में झांकने का प्रयास करती है, जब पाकिस्तान के ‘कहूटा परमाणु संयंत्र’ को लेकर भारत की चिंता चरम पर थी।

कहानी का सार: कब्रिस्तान से शुरू हुआ खुफिया मिशन
वेब सीरीज की शुरुआत इस्लामाबाद के एक वीरान कब्रिस्तान में होती है, जहां कर्नल अशफाक उल्लाह (सूर्या शर्मा) एक शख्स की हत्या करता है जिसने उसे कहूटा संयंत्र से जुड़ी गोपनीय फाइलें सौंपी हैं।

दूसरी ओर, भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ की एजेंट श्रीष्टि चतुर्वेदी (मौनी रॉय), ‘मरियम’ नाम से एक ट्यूशन टीचर के रूप में छिपकर अशफाक के नजदीक पहुंच चुकी है और स्पाई ग्लासेस के जरिए अहम सूचनाएं भारत भेज रही है।

ट्विस्ट तब आता है जब मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अधीर दयाल (पुर्णेन्दु भट्टाचार्य) फाइल देखकर अतीत में लौट जाते हैं। 1978 में वही अधीर (नवीन कस्तूरिया) एक जासूस के रूप में पाकिस्तान में तैनात थे, जिनका मिशन था – पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने से रोकना।

अभिनय की बात करें तो –
नवीन कस्तूरिया अपने शांत और सधे अभिनय से दर्शकों को बांधे रखते हैं। 1978 के सीन्स में वे एक ईमानदार और निडर जासूस के रूप में पूरी तरह फिट बैठते हैं।

मौनी रॉय भले ही आकर्षक दिखती हों, लेकिन उनके किरदार में गहराई की कमी साफ झलकती है। उनकी जासूसी का ट्रैक कई बार ‘बचाव की प्रतीक्षा करती नायिका’ जैसा लगता है, जो आज के दौर की एजेंट की परिकल्पना से कमजोर पड़ता है।

सूर्या शर्मा कर्नल अशफाक के किरदार में ठंडकभरा तनाव लाते हैं, वहीं मुकेश ऋषि जनरल जिया उल्लाह की भूमिका में कुछ ज्यादा ही नाटकीय लगते हैं।

सीरीज की खूबियां –

  • 1978 का कालखंड बखूबी दर्शाया गया है।
  • ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरित होकर कहानी में गंभीरता और सच्चाई की झलक मिलती है।
  • सिर्फ 30-30 मिनट के 5 एपिसोड्स में सीरीज पूरी होती है, जो एक वीकेंड में आराम से देखी जा सकती है।
  • ‘अजीत डोभाल’ जैसे असली किरदारों की छाया कहानी को प्रामाणिक बनाती है।

कमजोरियां –

  • 2025 की टाइमलाइन में वो रोमांच नहीं है जिसकी उम्मीद की जाती है।
  • मरियम की रेस्क्यू सीक्वेंस खिंचती हुई लगती है और आसानी से सुलझ जाती है।
  • कुछ दृश्य अविश्वसनीय हैं, जैसे – एक विस्फोट के बाद जासूस का पूरी तरह सुरक्षित बच निकलना।

अंतिम निष्कर्ष –
सलाहकार एक ऐसी वेब सीरीज है जो पुराने दौर की खुफिया दुनिया को आज के संकटों से जोड़ती है। हालांकि नई टाइमलाइन कमजोर है, लेकिन 1978 की कहानी और नवीन कस्तूरिया का अभिनय इस शो को एक बार देखने लायक जरूर बनाते हैं।

रेटिंग: ⭐⭐.5 / 5

टिप: इतिहास और जासूसी में रुचि रखने वालों के लिए एक छोटा लेकिन थ्रिलिंग अनुभव।

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