दंगों के जख्म और आज की सियासत: विवेक अग्निहोत्री की द बंगाल फाइल्स ने दिया फाइल्स त्रयी को भावनात्मक समापन

जब कोई इतिहास के दबे हुए सच को उजागर करने की कोशिश करता है, तो उसे अक्सर प्रोपेगेंडा कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की नई फिल्म द बंगाल फाइल्स यही असहज सच सामने रखती है। यह फिल्म उनकी बहुचर्चित फाइल्स ट्रिलॉजी की अंतिम कड़ी है, जिसमें पहले द ताशकंद फाइल्स और द कश्मीर फाइल्स शामिल रही हैं।

कहानी:

फिल्म हमें 16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे पर ले जाती है, जब जिन्ना के आह्वान पर बंगाल के नोआखली जिले में भयानक दंगे भड़के थे। सामूहिक हत्याओं, विस्थापन और भयावह हिंसा की पृष्ठभूमि में कथा बुनी गई है।
साल 2025 की समानांतर कहानी में सीबीआई अधिकारी शिवा पंडित (दर्शन कुमार) एक आदिवासी लड़की के लापता होने की गुत्थी सुलझाते हैं, जो उन्हें एक ताकतवर नेता सरदार हुसैनी (सास्वत चटर्जी) तक ले जाती है। यह समानांतर घटनाएं दर्शकों से बार-बार पूछती हैं—क्या हम सचमुच आज़ाद हैं या अब भी उन्हीं विभाजनों में बंधे हैं?

अभिनय और प्रस्तुति:

पल्लवी जोशी ने वृद्ध भारती बनर्जी के रूप में एक यादगार भूमिका निभाई है, जिनकी चुप्पी शब्दों से ज्यादा गहराई तक असर करती है। युवा भारती के रूप में सिमरत कौर का साहसी अभिनय भी प्रभावित करता है। दर्शन कुमार का गहन और भावुक अभिनय उन्हें सीबीआई अधिकारी शिवा के किरदार में विश्वसनीय बनाता है।
मिथुन चक्रवर्ती टूटे हुए और अपराधबोध से ग्रस्त पुलिस अफसर के रूप में चमकते हैं। सास्वत चटर्जी और नमाशी चक्रवर्ती खलनायकी को मजबूती देते हैं, जबकि अनुपम खेर गांधी की भूमिका में मिश्रित छाप छोड़ते हैं।

फिल्म की विशेषताएं:

फिल्म की 3 घंटे 30 मिनट की लंबी अवधि के बावजूद दर्शक बंधे रहते हैं। एक ही शॉट में फिल्माए गए दंगों के दृश्य और प्रामाणिक सेट डिज़ाइन दर्शकों को उस दौर में ले जाते हैं। रोहित शर्मा का संगीत फिल्म की धड़कन बनकर चलता है और लोकधुनों का इस्तेमाल भावनात्मक गहराई को और बढ़ा देता है।

कमियां:

कुछ जगहों पर एडिटिंग कमजोर नजर आती है और वीएफएक्स तथा प्रोस्थेटिक मेकअप में खामियां दिखती हैं। साथ ही कुछ पात्रों का हिंदी उच्चारण अविश्वसनीय लगता है, जिससे स्थानीयता की प्रामाणिकता प्रभावित होती है।

असरदार अंत:

अग्निहोत्री की फिल्मों की तरह यहां भी दर्शकों को क्लीन एंडिंग नहीं मिलती। नायक जीतते नहीं, बल्कि टूटते हैं और यही दर्द दर्शकों के साथ घर तक जाता है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5)


 

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