‘मारेesan’ : सुनहरी सोच पर उलझी पटकथा, अभिनय ही बना सहारा
नई दिल्ली। नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज़ हुई तमिल फ़िल्म ‘मारेesan’ का नाम रामायण के उस सुनहरे हिरण से प्रेरित है, जिसने लक्ष्मण को भ्रमित कर सीता हरण का रास्ता बनाया था। ठीक उसी तरह, फ़िल्म में भी एक अदृश्य सा विचलन और फंसाव देखने को मिलता है, मगर कहानी इस विचार को पूरी तरह साध नहीं पाती।
फ़िल्म की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज़ में होती है। कुछ हास्य दृश्य और फ़हद फ़ासिल का एक साधारण चोर का रूप, दर्शकों को शुरुआत में आकर्षित करता है। लेकिन असली चमक आती है वडिवेलु की मौजूदगी से। उनकी और फ़हद की जुगलबंदी पर्दे पर ताजगी लाती है और कई जगहों पर वडिवेलु अपने अभिनय से बाज़ी मार ले जाते हैं।
हालाँकि, जिस दोस्ती को फ़िल्म का भावनात्मक आधार बनना चाहिए था, वही सबसे कमज़ोर कड़ी बन जाती है। चोर और बूढ़े व्यक्ति का रिश्ता ‘कैसे’ और ‘क्यों’ गहराता है, इसका उत्तर फ़िल्म कभी नहीं देती। यही अधूरापन आगे चलकर कहानी की पकड़ ढीली कर देता है।
दूसरे हाफ़ में पटकथा अचानक मोड़ लेती है—कभी सस्पेंस, तो कभी ऐक्शन, तो कहीं फ्लैशबैक। लेकिन यह सब जोड़-तोड़ ज़्यादा लगता है, बजाय एक सधे हुए प्रवाह के। परिणाम यह कि न तो ट्विस्ट असरदार लगते हैं और न ही अंत तक खींचा गया एक्शन दर्शकों को संतुष्ट कर पाता है।
संक्षेप में, पहला हिस्सा ज़रूरत से लंबा है और दूसरा हिस्सा बिखरा हुआ। फ़िल्म में एक दमदार और संक्षिप्त रूप छिपा हुआ था, लेकिन कमजोर लेखन और उलझी प्रस्तुति ने उसकी धार कुंद कर दी।
जहाँ तक बात अभिनय की है, वहीं फ़िल्म को बचाता है। फ़हद फ़ासिल और वडिवेलु दोनों अपने-अपने हिस्से में पूरी शिद्दत से उतरते हैं और दर्शकों को जोड़े रखते हैं।
निर्णय : ‘मारेesan’ देखने लायक केवल इसलिए है क्योंकि इसमें कलाकारों का प्रदर्शन बेहतरीन है। लेकिन बतौर कहानी यह औसत ही साबित होती है।
रेटिंग : ⭐⭐⭐ (तीन सितारे)