पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच संघर्षविराम के बाद क्या टिकेगी शांति?

— अमर शर्मा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक

इस्लामाबाद/काबुल।
कतर और तुर्की की मध्यस्थता के बाद पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच रविवार को हुए संघर्षविराम से हालिया हिंसक झड़पों पर फिलहाल विराम लगा है। लेकिन सवाल यह है कि यह शांति कितने दिनों तक टिक पाएगी? बीते कुछ हफ्तों में दोनों देशों के बीच कई वर्षों में सबसे गंभीर सैन्य संघर्ष देखने को मिला, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए।

संघर्षविराम के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे की भौगोलिक अखंडता का सम्मान करने का वादा किया है और इस सप्ताह इस्तांबुल में आगे की वार्ता के लिए मुलाकात तय की है। हालांकि, दोनों के बीच असली विवादों का समाधान अभी तक नहीं हुआ है।


आतंकवाद की शरणस्थली बना अफगानिस्तान

इस विवाद की जड़ पाकिस्तान का यह आरोप है कि अफगान तालिबान, पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) को न केवल शरण दे रहा है बल्कि उन्हें सशस्त्र सहायता भी प्रदान कर रहा है। इस्लामाबाद का दावा है कि अफगान तालिबान, पाकिस्तान को उसी तरह की कट्टर इस्लामी शासन व्यवस्था की ओर धकेलना चाहता है, जैसी अफगानिस्तान में है।

अफगान तालिबान ने इन आरोपों का खंडन किया है, लेकिन 2021 में अमेरिका और उसके सहयोगियों के अफगानिस्तान से निकलने के बाद तालिबान के शासन ने देश को फिर से आतंकी संगठनों के केंद्र में बदल दिया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, टीटीपी को अफगानिस्तान में न केवल पनाह दी गई है, बल्कि उन्हें उन अमेरिकी हथियारों तक पहुंच भी मिली है जो करीब 7 अरब डॉलर मूल्य के वहां छूट गए थे।

परिणामस्वरूप, टीटीपी ने पाकिस्तान में हमलों की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ा दी है, जिससे इस्लामाबाद का धैर्य अब जवाब देता दिख रहा है।


भारत से बढ़ते तालिबान संबंधों से भी असहज पाकिस्तान

तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की हालिया नई दिल्ली यात्रा ने पाकिस्तान की चिंता और बढ़ा दी है। भारत द्वारा तालिबान प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत करना इस्लामाबाद के लिए संकेत है कि उसका पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र अब बदल रहा है। पाकिस्तान हमेशा से अफगानिस्तान को अपने “रणनीतिक पिछवाड़े” (Strategic Backyard) के रूप में देखता आया है।


शरणार्थियों की वापसी और सीमा पर हमले

पाकिस्तान ने हाल के महीनों में लाखों अफगान शरणार्थियों को वापस भेजने की नीति अपनाई है, जिनमें से कई तालिबान शासन के उत्पीड़न से भागे थे। इसके साथ ही इस्लामाबाद ने कई बार अफगान सीमाई इलाकों में हवाई हमले भी किए हैं।

संघर्ष की ताज़ा लहर तब शुरू हुई जब टीटीपी ने पाकिस्तान में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र पर आत्मघाती हमला किया, जिसमें 23 लोग मारे गए। इसके जवाब में पाकिस्तान ने काबुल और कंधार में टीटीपी ठिकानों पर बमबारी की, जहां तालिबान सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा के होने की खबर थी।

इस पर तालिबान ने डूरंड रेखा (Durand Line) के पास पाकिस्तानी चौकियों पर हमला कर दिया, जिससे दोनों ओर भारी जान-माल की क्षति हुई। पाकिस्तान ने इसके बाद अफगान ट्रांजिट व्यापार मार्ग भी बंद कर दिया, जिससे अफगान अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा।


पाकिस्तान की अपनी नीति का परिणाम

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि आज पाकिस्तान जिस स्थिति में है, उसका जिम्मेदार वही खुद है। तीन दशकों से पाकिस्तान ने तालिबान को एक रणनीतिक “संपत्ति” की तरह पोषित किया — आतंकवाद का विरोध करने का दिखावा करते हुए उसे भारत-विरोधी प्रभाव क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल किया।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में स्वीकार किया कि देश ने हमेशा “दोहरी विदेश नीति” अपनाई — एक तरफ आतंकवाद का विरोध, दूसरी तरफ आतंकियों को रणनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल।

1990 के दशक में तालिबान को सत्ता में लाने से लेकर 2001 में 9/11 के बाद अमेरिकी हस्तक्षेप और 2021 में उनकी वापसी तक — यह कहानी पाकिस्तान की “पालित शक्ति के पलटवार” (Blowback of a Patron-Client Relationship) की है।


आगे का रास्ता

यह संघर्ष पाकिस्तान और अफगान जनता के बीच नहीं, बल्कि पाकिस्तान और तालिबान सरकार के बीच है। अफगान जनता तालिबान की दमनकारी और मध्ययुगीन शासन से पीड़ित है। अफगानिस्तान में स्थायी शांति केवल तभी संभव है जब वहां के लोग स्वयं तालिबान शासन का विरोध करें।

इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्वार्थरहित सहयोग देना होगा — ताकि अफगान समाज अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय कर सके। आंतरिक प्रतिरोध और बाहरी कूटनीतिक दबाव, यही तालिबान शासन को कमजोर करने का सबसे मानवीय और प्रभावी मार्ग है।


(लेखक: अमर शर्मा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और विदेश नीति विश्लेषक हैं।)

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