ढलती रोशनी का दर्शन : अंत की ओर बढ़ता दिन और स्पष्ट होती दुनिया
लेख : अमर शर्मा | संपादन : निहाल कुमार दत्ता
देहरादून की एक खिड़की से झांकता हुआ दिन, जैसे खुद अपने अंत की घोषणा कर रहा हो। जैसे-जैसे रोशनी दुबली होती जाती है, आकाश का रंग और गाढ़ा होता चला जाता है—आड़ू, नारंगी, सिंदूरी। मानो दिन, जाते-जाते भी ठहर जाने की कोई तरकीब खोज रहा हो। लेकिन कुछ सच्चाइयाँ ऐसी होती हैं जो केवल अंत के पास आकर ही साफ दिखाई देती हैं।
दिन का अंत—डे-एंड। यह शब्द अपने आप में ठहराव लिए है। ‘अंत’ के बाद कुछ नहीं आता। शायद इसी खालीपन से डरकर हमने ‘एंडिंग’ जैसे शब्द गढ़े, ताकि विदा को भी निरंतरता का भ्रम दिया जा सके। शाम, वास्तव में किसी अंत की पूर्व संध्या ही तो है।
घास पर लेटी हुई रोशनी को देखिए। वह आकाश से गिरी हुई प्रतीत होती है—टूटी नहीं है, लेकिन उठने की कोई जल्दी भी नहीं। बंगला में इसे ‘पोरंतो रोद’ कहा जाता है—गिरती हुई धूप। भाषा ने इस पल को पकड़ लिया है, जैसे वह भी रोशनी को जाने से रोकना चाहती हो। इसके बाद आती है ‘कोने देखार आलो’, वह उजाला जिसमें सब कुछ सुंदर लगता है, और फिर ‘गोधूलि’—धूल भरी वह घड़ी जब गायें लौटती हैं और दिन सचमुच विदा लेता है।
रोशनी के घटने के साथ दुनिया और स्पष्ट होने लगती है। जो पहाड़ी कुछ देर पहले सिर्फ धुंधली रेखा थी, अब उसका आकार दिखने लगता है। अंधेरा, विरोधाभासी रूप से, दृश्यता बढ़ा देता है। घास अब केवल घास नहीं रहती, उसकी नमी भी दिखने लगती है। शायद अंत की ओर बढ़ना हमें चीज़ों की गहराई देखने का अवसर देता है—एक अंतिम उपहार की तरह।
यह दृश्य कलाकार सेज़ान की याद दिलाता है, जिसने जीवन के अंतिम वर्षों में एक ही पहाड़ी को बार-बार चित्रित किया। क्या वह अनजाने में अपने अंत की ओर बढ़ते हुए, उस स्थायित्व को पकड़ना चाहता था जो पहाड़ों में दिखता है? मनुष्य शायद संतान, कृति या स्मृति के ज़रिये अमरता खोजता है—अंत से बचने का प्रयास।
अंधेरा गाढ़ा होता है। पेड़ों की छाया मिट जाती है, उनकी काली संरचना उभर आती है। पक्षी दूर से कौवे से लगते हैं। कहीं दूर चूल्हों का धुआँ उठ रहा है—काला, सफेद—आकाश पर पड़े घावों की तरह। जलना, रूप बदलना, खत्म होना—हर जगह अंत की सूचना है।
दिन भर रोशनी हमें घेरे रहती है। हमारी परछाइयाँ लंबी-छोटी होती रहती हैं, समय का बोध कराती हैं। दोपहर में वे अचानक गायब हो जाती हैं, जैसे अंत का पूर्वाभ्यास। फिर लौट आती हैं। रोशनी दाँतों की तरह नहीं सड़ती, वह बस धीमी होती है, बुझ जाती है। दिसंबर की तरह।
इसीलिए हम दीये जलाते हैं—रोशनी को थोड़ा और ज़िंदा रखने के लिए। सुबह और रात—दोनों के लिए हम ‘गुड’ शब्द का प्रयोग करते हैं, लेकिन दोनों का अर्थ अलग है। सुबह में आरंभ की आशा है, रात में अंत की स्वीकृति।
हम अपने जीवन को मध्यांतर की तरह जीते हैं—मध्य और अंत के बीच। और शायद यहीं आकर समझ में आता है कि सिर्फ ‘अंत’ ही नहीं, ‘अच्छा’ शब्द भी ‘द’ पर खत्म होता है। जैसे हर पूर्णता, हर भलाई, कहीं न कहीं समाप्ति को स्वीकार करती है।