लेखन का अंत या लेखक का संकट? एल्गोरिद्म के दौर में रचनात्मकता पर सवाल
By – Amar Sharma
पटना:डिजिटल युग में लेखन अब केवल विचारों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अनुकूलन (ऑप्टिमाइज़ेशन) की प्रक्रिया बनता जा रहा है। आज लेखक शब्दों को पाठक के मन तक पहुँचाने से अधिक, सर्च इंजन, सोशल मीडिया एल्गोरिद्म और व्यू काउंट को ध्यान में रखकर गढ़ने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या सचमुच “लेखक की मृत्यु” हो चुकी है?
साहित्य और मीडिया जगत में लंबे समय से यह बहस चल रही है कि लेखन की आत्मा क्या है—लेखक का दृष्टिकोण या पाठक की व्याख्या। लेकिन मौजूदा दौर में इस बहस में एक नया तत्व जुड़ गया है—डिजिटल प्लेटफॉर्म का दबाव। आज लेखन की गुणवत्ता का पैमाना विचारों की गहराई नहीं, बल्कि क्लिक, लाइक, शेयर और ट्रेंड बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहले लेखक अपने अनुभव, समाज और समय से संवाद करता था, जबकि अब वह डेटा और एनालिटिक्स से निर्देशित हो रहा है। शीर्षक से लेकर भाषा तक, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा शब्द अधिक देखा जाएगा और कौन-सा विषय अधिक वायरल होगा। इस प्रक्रिया में रचनात्मक जोखिम कम हो रहा है और सुरक्षित, लोकप्रिय ढर्रे पर लिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
हालांकि, कुछ साहित्यकार और पत्रकार इसे लेखन के अंत के बजाय लेखन के नए रूप के तौर पर देखते हैं। उनका कहना है कि हर युग में माध्यम बदले हैं—मौखिक परंपरा से मुद्रित शब्द और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म तक। चुनौती यह है कि लेखक इस दबाव के बीच भी अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और ईमानदारी को कैसे बचाए।
आज के समय में सवाल यह नहीं है कि लेखक जीवित है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह एल्गोरिद्म के शोर में अपनी आवाज़ पहचान पा रहा है। लेखन यदि केवल अनुकूलन बनकर रह गया, तो समाज का दर्पण बनने वाली उसकी भूमिका कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में जरूरत है कि लेखक तकनीक का उपयोग करे, लेकिन उसका दास न बने—ताकि शब्द सिर्फ बिकें नहीं, बल्कि सोच भी पैदा करें।