नए साल का बोझ और टूटते संकल्प: बदलाव को अपनाने की एक दार्शनिक डायरी
लेखक: अमर शर्मा | संपादन: निहाल
विशेष लेख
नया साल आते ही आधी रात के साथ उम्मीदों का एक नया पुलिंदा खुल जाता है। घड़ी की सुइयाँ जैसे ही बारह पर टिकती हैं, आतिशबाज़ी और शोर के बीच इंसान खुद से कुछ वादे कर लेता है—जो अक्सर अगले कुछ हफ्तों में ही दम तोड़ देते हैं। बीता साल भी इससे अलग नहीं रहा। पुराने संकल्पों की एक पीली पड़ चुकी सूची हर नए साल पर आईना दिखाती है—कि कितने वादे किए गए और कितने निभाए गए।
सबसे आम संकल्प वही होता है—वज़न कम करने का। दुनिया भर में यह संकल्प हर साल दोहराया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि ज़्यादातर लोग फरवरी आते-आते इसे भूल चुके होते हैं। शरीर हल्का करने की कसम खाकर साल शुरू होता है और साल के अंत तक वही बोझ जस का तस खड़ा रहता है—शरीर पर भी और मन पर भी।
इन टूटते संकल्पों के बीच लेखक ने शरण ली विचारकों की दुनिया में। क्या सदियों पुराने दर्शन में कोई ऐसा वादा छुपा है, जिसे निभाया जा सके?
दार्शनिक कीर्केगार्द ने चलने की सलाह दी—लेकिन आज के शहरी जीवन में, जहाँ हवा ही साँसों की दुश्मन बन चुकी है, यह सलाह किसी विलास से कम नहीं। अरस्तू ने मित्रों के साथ समय बिताने को जीवन का सार बताया, मगर आधुनिक जीवन की विडंबना यह है कि दोस्तों की सूची हर साल छोटी होती जा रही है।
नीत्शे ने आत्मचिंतन का बोझ डाल दिया—“जो हो, वही बनो।” यह वाक्य हौसला देने के बजाय बेचैन कर देता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इंसान वही बन चुका है, जो वह असल में है—थोड़ा थका हुआ, थोड़ा अकेला और संकल्पों के मामले में कमजोर?
बुद्ध ने पढ़ने की प्रेरणा दी, लेकिन किताबों की अलमारी में सजी अधपढ़ी किताबें मानो यह याद दिलाने लगीं कि एक जीवन शायद कम पड़ जाए। सिमोन द बोउवार ने जीवन की कमान अपने हाथ में लेने का आदेश दिया, मगर सवाल वही रहा—अगर यह इतना आसान होता, तो नए साल के संकल्पों की ज़रूरत ही क्या थी?
आख़िरकार समाधान मिला यूनानी दार्शनिक हेराक्लाइटस में। उन्होंने न आदेश दिया, न उपदेश—बस परिवर्तन को स्वीकार करने की बात कही। उनके अनुसार जीवन निरंतर बहाव है, और बदलाव ही उसका स्वभाव। उम्र, शरीर और सोच—सब बदलते हैं, और इसमें कोई अपराधबोध नहीं होना चाहिए।
इसी सोच के साथ यह नया साल एक अलग संकल्प लेकर आता है। न वज़न घटाने की कसम, न अधूरी आदतों की लंबी सूची। बस एक वादा—बदलाव को अपनाने का। शायद यही सबसे ईमानदार और निभाने लायक संकल्प है।
इस 31 दिसंबर, जब घड़ी फिर बारह बजाएगी, तो संकल्पों की जगह एक स्वीकार होगा—कि जीवन जैसा है, वैसा ही बहने दिया जाए। यही होगा इस साल का असली संकल्प—हेराक्लाइटस का साल।