इश्क़ जो राख में भी रोशनी छोड़ जाए: शमा और परवाना
लेखक: अमर शर्मा | संपादन: निहाल कुमार दत्ता
कभी-कभी प्रेम शब्दों का मोहताज नहीं होता। वह बस जलता है—चुपचाप, निरंतर, उजास बनकर। शमा और परवाना उसी प्रेम का रूपक हैं, जहाँ चाहत तर्क नहीं मांगती, और समर्पण किसी परिणाम की शर्त पर नहीं टिकता। शमा की लौ में कोई आमंत्रण नहीं, फिर भी परवाना खिंचता चला आता है। यह आकर्षण नहीं, यह नियति है।
मिर्ज़ा ग़ालिब ने शायद इसी अनकहे आकर्षण को महसूस करते हुए कहा था
“शमा बुझा भी दे आग, पर असर बाकी रहता है,
इश्क़ वह ज़ख़्म है ग़ालिब, जो भर कर भी हरा रहता है।”
शमा जलती है ताकि अंधेरा टूटे। उसकी आग में अहंकार नहीं, सेवा है। वह जानती है कि जलते-जलते ही उसका अस्तित्व अर्थ पाता है। दूसरी ओर परवाना—जिसे अक्सर मूर्ख कहा गया—असल में साहसी है। वह जानता है कि लौ के पास जाना अंत हो सकता है, फिर भी वह जाता है, क्योंकि कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जिनमें बचना कायरता है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ यहाँ जैसे परवाने की आत्मा बन जाती हैं
“मिटा दो अपना वजूद, अगर इश्क़ मुकम्मल हो जाए,
ये आग वही जानती है, जो खुद इसमें जल जाए।”
यह कथा केवल इश्क़ की नहीं, विचार की भी है। समाज में शमा वे लोग हैं जो खुद को खपा देते हैं—शिक्षक, कलाकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता—जो रोशनी बांटते हैं और बदले में धुआँ पीते हैं। और परवाने वे हैं जो उस रोशनी से जीवन का अर्थ खोजते हैं, जोखिम उठाते हैं, सवाल करते हैं, और कभी-कभी जल भी जाते हैं।
अकबर इलाहाबादी ने शमा–परवाना को समाज के इसी द्वंद्व में देखा था
“शमा ने जल के सिखाया है ये सबक दुनिया को,
कि रोशनी बाँटने की क़ीमत अंधेरा ही होता है।”
शमा और परवाना हमें यह भी सिखाते हैं कि प्रेम अधिकार नहीं, अर्पण है। यहाँ कोई मांग नहीं, कोई सौदा नहीं। शमा नहीं कहती “आओ”, परवाना नहीं कहता “मुझे चाहिए”—दोनों अपने-अपने सत्य में पूर्ण हैं। यही उनकी सुंदरता है। यही उनकी त्रासदी भी।
जिगर मुरादाबादी ने इस समर्पण को बेहद सादगी से कहा
“वो शमा क्या जले जो परवाने को आज़माए,
वो इश्क़ क्या करे जो ख़ुद को न मिटाए।”
आज के समय में, जहाँ प्रेम गणना बन गया है और संबंध शर्तों पर टिके हैं, शमा और परवाना हमें याद दिलाते हैं कि सबसे सच्ची रोशनी वही है जो खुद को जला देती है, और सबसे ईमानदार उड़ान वही है जो डर के बावजूद लौ की ओर बढ़ती है।
शायद इसीलिए यह कथा कभी पुरानी नहीं होती। हर पीढ़ी में शमाएँ जन्म लेती हैं और परवाने उड़ते हैं। कुछ राख बनते हैं, कुछ उजास। पर कथा चलती रहती है—जैसे अंधेरे में एक छोटी-सी लौ, जो कहती है—
“प्रेम अगर जलाए नहीं,
तो वह रोशन कैसे करेगा?”