ईरान हमलों के बाद नई तेल रणनीति की जरूरत
— अमर शर्मा, टीडब्ल्यूएम न्यूज़
दुनिया की राजनीति में तेल सिर्फ एक ऊर्जा संसाधन नहीं, बल्कि शक्ति और रणनीति का सबसे बड़ा उपकरण रहा है। इतिहास गवाह है कि जब-जब मध्य-पूर्व में संघर्ष बढ़ा है, तब-तब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका सीधा प्रभाव पड़ा है। हाल में ईरान पर हुए हमलों और उसके बाद बढ़ते तनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया को अब एक नई तेल रणनीति की जरूरत है।
आज विश्व की लगभग तीन-चौथाई आबादी ऐसे देशों में रहती है जो तेल के आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होती है तो उसका असर सिर्फ ऊर्जा बाजार पर नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। यही वजह है कि ईरान-अमेरिका टकराव और समुद्री मार्गों पर खतरे ने दुनिया को चिंतित कर दिया है।
दरअसल, फारस की खाड़ी और विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। यदि यहां कोई सैन्य या राजनीतिक संकट पैदा होता है तो वैश्विक बाजार में तुरंत अस्थिरता दिखाई देती है और तेल की कीमतों में तेज उछाल आ जाता है।
हालिया संघर्ष के बाद यही स्थिति देखने को मिल रही है। कई रिपोर्टों के अनुसार युद्ध और समुद्री मार्गों पर खतरे के कारण तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है। यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।
ऐसे समय में दुनिया के बड़े देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की है। कई देश वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहे हैं, कुछ देश अपने रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग करने पर विचार कर रहे हैं, जबकि कई राष्ट्र नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ने की रणनीति बना रहे हैं। यह साफ है कि सिर्फ एक क्षेत्र पर निर्भर ऊर्जा व्यवस्था भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है।
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। इसलिए मध्य-पूर्व में किसी भी तरह की अस्थिरता सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर असर डाल सकती है।
यही कारण है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि ऊर्जा नीति को केवल तत्काल जरूरतों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। दीर्घकालिक रणनीति, ऊर्जा के विविध स्रोत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही भविष्य की स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं।
स्पष्ट है कि ईरान संकट ने सिर्फ एक क्षेत्रीय युद्ध का रूप नहीं लिया है, बल्कि इसने वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया है। ऐसे में यह समय है जब दुनिया को नई तेल रणनीति पर गंभीरता से विचार करना होगा—ताकि भविष्य में किसी एक संघर्ष से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था संकट में न पड़ जाए।