ईरान को आर्थिक घेराबंदी से हराना अमेरिका के लिए आसान नहीं

ओपिनियन | अमर शर्मा

अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए एक बार फिर प्रतिबंधों का सहारा लिया है। 24 अगस्त को वॉशिंगटन ने ईरान की अर्थव्यवस्था से जुड़े 60 व्यक्तियों, संस्थाओं और जहाजों को निशाना बनाते हुए नए प्रतिबंध लगाए। इसका उद्देश्य ईरान पर इतना आर्थिक दबाव बनाना है कि वह परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर समझौते के लिए मजबूर हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या आर्थिक घेराबंदी वास्तव में तेहरान को झुकाने में सफल होगी?

ईरान के खिलाफ प्रतिबंध कोई नई रणनीति नहीं हैं। दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान ने इनके बीच अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिए वैकल्पिक रास्ते विकसित कर लिए हैं। चीन इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ईरानी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है। इसके अलावा ईरान शैडो बैंकिंग और वैकल्पिक शिपिंग नेटवर्क का इस्तेमाल करता रहा है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिबंधों का ईरान पर असर नहीं पड़ा है। ईरानी मुद्रा रियाल कमजोर हुई है, महंगाई बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंची है और युद्ध तथा प्रतिबंधों के कारण तेल उद्योग एवं रिफाइनरियों पर भी दबाव बढ़ा है। ईरान के तेल निर्यात में भी गिरावट आई है। फिर भी आर्थिक संकट और राजनीतिक आत्मसमर्पण एक ही बात नहीं हैं।

यही अमेरिकी रणनीति की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वॉशिंगटन चीन के बैंकों और संस्थाओं पर भी व्यापक प्रतिबंध लगाता है तो मामला केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं रहेगा। यह सीधे अमेरिका-चीन आर्थिक टकराव का नया मोर्चा खोल सकता है। चीन पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपने वैध आर्थिक हितों की रक्षा करेगा।

इसलिए अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती है। वह ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना चाहता है, लेकिन साथ ही चीन के साथ व्यापक आर्थिक संघर्ष से भी बचना चाहता है। यही विरोधाभास आर्थिक दबाव की प्रभावशीलता को सीमित कर सकता है।

ईरान के लिए रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र होर्मुज जलडमरूमध्य है। वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और होर्मुज में किसी भी तरह का व्यवधान अमेरिका सहित पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। लाल सागर और यमन में हूती गतिविधियां इस संकट को और जटिल बनाती हैं।

अमेरिका के लिए घरेलू राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारक है। अगर सैन्य कार्रवाई लंबे समय तक चलती है और ऊर्जा कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर अमेरिकी मतदाताओं पर पड़ सकता है। ऐसे में वॉशिंगटन के लिए ऐसी रणनीति तलाशना जरूरी होगा जिसमें ईरान पर दबाव भी बना रहे और संघर्ष को एक बड़े युद्ध में बदलने से भी रोका जा सके।

सबसे अहम मुद्दा अब भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। सैन्य दबाव के बावजूद इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। आर्थिक प्रोत्साहन और प्रतिबंधों में राहत के प्रस्ताव भी तेहरान को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल दबाव के जरिए ईरान से व्यापक राजनीतिक समझौता करवाना आसान नहीं होगा।

ईरान भी अपनी स्थिति को पहले की तुलना में मजबूत मान सकता है। क्षेत्रीय परिस्थितियां, यमन में हूती समूह की गतिविधियां और चीन के साथ आर्थिक संबंध उसे बातचीत की मेज पर कुछ अतिरिक्त विकल्प देते हैं। तेहरान संभवतः किसी भी समझौते के बदले आर्थिक और रणनीतिक रियायतों की मांग करेगा।

ऐसे में अमेरिका के सामने सबसे व्यावहारिक रास्ता बातचीत का ही दिखाई देता है। आर्थिक प्रतिबंध ईरान को कमजोर कर सकते हैं, लेकिन अगर उनका उद्देश्य राजनीतिक समझौता है तो प्रतिबंधों के साथ कूटनीतिक रास्ता भी खुला रखना होगा। दबाव इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि ईरान के लिए समझौते की गुंजाइश ही खत्म हो जाए।

भारत के लिए भी इस पूरे घटनाक्रम के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों, होर्मुज से होने वाले समुद्री व्यापार और लाल सागर के रास्ते वैश्विक शिपिंग पर असर पड़ सकता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विदेश व्यापार इसलिए इस संघर्ष से सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

आखिरकार, ईरान की आर्थिक घेराबंदी का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अमेरिका तेहरान पर कितना आर्थिक दबाव डाल सकता है। असली सवाल यह है कि क्या उस दबाव को किसी राजनीतिक समाधान में बदला जा सकता है। अगर आर्थिक युद्ध अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, खाड़ी तनाव और लाल सागर संकट को और बढ़ाता है, तो इसका नुकसान केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।

अमर शर्मा
TWM News

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