सैन्य ताकत से युद्ध जीते नहीं जाते, जीत के लिए रणनीति जरूरी है

ओपिनियन | अमर शर्मा | TWM News

युद्ध के मैदान में ताकत का अर्थ हमेशा जीत नहीं होता। आधुनिक दुनिया के कई संघर्ष यह साबित कर रहे हैं कि किसी देश के पास अत्याधुनिक हथियार, बड़ी सेना, मिसाइलें, ड्रोन और भारी सैन्य बजट हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद वह अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने में असफल रह सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रूस के पास यूक्रेन की तुलना में कहीं अधिक सैन्य संसाधन हैं, लेकिन वर्षों के युद्ध के बाद भी वह यूक्रेन को अपनी शर्तों पर समझौते के लिए मजबूर नहीं कर पाया है। दूसरी ओर यूक्रेन के लिए युद्ध जीतने का अर्थ जरूरी नहीं कि वह रूस की जमीन पर कब्जा करे। उसके लिए अपनी संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता बचाए रखना भी एक बड़ी रणनीतिक सफलता है।

यही आधुनिक युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण बदलती हुई तस्वीर है।

मजबूत पक्ष के सामने जीत की बड़ी चुनौती

किसी आक्रामक देश के सामने युद्ध में एक स्पष्ट लक्ष्य होता है—उसे कुछ हासिल करना होता है। जमीन पर कब्जा, सत्ता परिवर्तन, राजनीतिक समझौता या दुश्मन को अपनी शर्तें मानने के लिए मजबूर करना।

लेकिन रक्षात्मक पक्ष की स्थिति अलग होती है। उसे हर बार दुश्मन को पूरी तरह हराना जरूरी नहीं। कई बार केवल इतना पर्याप्त होता है कि वह दुश्मन को उसके लक्ष्य हासिल करने से रोक दे।

यही वजह है कि कमजोर दिखाई देने वाला पक्ष भी लंबे युद्ध में रणनीतिक रूप से सफल हो सकता है।

सरल शब्दों में कहें तो मजबूत पक्ष को जीतना पड़ता है, जबकि कमजोर पक्ष को केवल हारने से बचना होता है।

समय भी एक हथियार है

युद्ध में हथियारों के अलावा समय भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है।

बड़ी सैन्य शक्तियां अक्सर तेज और निर्णायक परिणाम चाहती हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि शुरुआती सैन्य दबाव के बाद विरोधी टूट जाएगा और युद्ध जल्द समाप्त हो जाएगा। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो समय धीरे-धीरे उसी मजबूत शक्ति के खिलाफ काम करने लगता है।

यूक्रेन ने युद्ध के शुरुआती दौर में रूस के तेज अभियान को रोककर यही अवसर हासिल किया। उसे अपनी सेना को संगठित करने, समाज को लामबंद करने और पश्चिमी देशों से समर्थन हासिल करने का समय मिला।

यही कारण है कि आधुनिक युद्ध केवल टैंकों और लड़ाकू विमानों की लड़ाई नहीं रह गया है। ड्रोन, साइबर क्षमता, आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा ढांचा, समुद्री रास्ते, सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

युद्ध की सीमा अब सिर्फ मोर्चे तक नहीं

आज किसी युद्ध का असर उस जगह तक सीमित नहीं रहता जहां गोलियां चल रही हैं।

तेल की पाइपलाइन, रिफाइनरी, बंदरगाह, समुद्री व्यापार मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति और हथियारों की सप्लाई भी निशाना बन सकती है। यानी युद्ध का मैदान भौगोलिक सीमाओं से कहीं बड़ा हो चुका है।

यूक्रेन और रूस के बीच संघर्ष में ड्रोन और ऊर्जा ढांचे पर हमले इसका उदाहरण हैं। इसी तरह मध्य-पूर्व में संघर्ष का असर समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच सकता है।

इसका मतलब साफ है—आज युद्ध जीतने के लिए केवल दुश्मन की सेना को नुकसान पहुंचाना पर्याप्त नहीं है।

सैन्य कार्रवाई के बाद क्या?

यहीं से सबसे कठिन सवाल शुरू होता है।

आप किसी देश के सैन्य ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं। उसकी मिसाइल क्षमता को कमजोर कर सकते हैं। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन इसके बाद क्या?

क्या उस देश की राजनीतिक व्यवस्था आपकी इच्छा के अनुसार बदल जाएगी?

क्या वह भविष्य में फिर से अपनी सैन्य क्षमता विकसित नहीं करेगा?

क्या वहां ऐसा स्थायी राजनीतिक समाधान बन जाएगा जो युद्ध के कारणों को खत्म कर सके?

इतिहास बताता है कि इन सवालों का जवाब हमेशा ‘हां’ नहीं होता।

सैन्य शक्ति दबाव पैदा कर सकती है, लेकिन स्थायी राजनीतिक समाधान पैदा करना सैन्य शक्ति से कहीं अधिक कठिन काम है।

अफगानिस्तान और वियतनाम से भी सबक

आधुनिक इतिहास में कई बार बड़ी सैन्य शक्तियों को यह अनुभव हुआ कि युद्ध के मैदान में श्रेष्ठ होने के बावजूद वे अपने राजनीतिक उद्देश्य हासिल नहीं कर सकीं।

वियतनाम और अफगानिस्तान ने दिखाया कि स्थानीय प्रतिरोध, समय और राजनीतिक इच्छाशक्ति का मेल अत्यधिक सैन्य शक्ति के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

कमजोर पक्ष को हमेशा दुश्मन की सेना को नष्ट करने की जरूरत नहीं होती। उसे केवल इतना करना होता है कि युद्ध की कीमत इतनी बढ़ जाए कि मजबूत पक्ष के लिए उसे जारी रखना मुश्किल हो जाए।

परमाणु शक्ति भी राजनीतिक जीत की गारंटी नहीं

परमाणु हथियार किसी देश की प्रतिरोधक क्षमता को बेहद मजबूत बना सकते हैं। लेकिन परमाणु शक्ति होने का अर्थ यह नहीं कि कोई देश हर राजनीतिक उद्देश्य हासिल कर सकता है।

परमाणु हथियार मुख्य रूप से बड़े स्तर के विनाश को रोकने और प्रतिरोध पैदा करने का साधन हैं। उनका अस्तित्व अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि युद्ध के बाद स्थायी शांति या मनचाहा राजनीतिक परिणाम हासिल हो जाएगा।

यही आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की विडंबना है—देशों के पास पहले से ज्यादा विनाशकारी हथियार हैं, लेकिन युद्ध को निर्णायक रूप से समाप्त करने की क्षमता उतनी स्पष्ट नहीं है।

असली जीत क्या है?

आज शायद युद्ध की परिभाषा को ही नए सिरे से समझने की जरूरत है।

क्या जीत का मतलब दुश्मन की राजधानी पर कब्जा करना है?

क्या जीत का मतलब उसकी सेना को पूरी तरह खत्म करना है?

या फिर जीत का मतलब अपने मूल राजनीतिक और सुरक्षा हितों को बचाए रखना है?

रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे युद्ध बताते हैं कि इन सवालों का जवाब पहले जैसा सरल नहीं रहा।

एक बड़ी सैन्य शक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी को भारी नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन यदि वह अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाती तो उसकी सैन्य सफलता अधूरी रह जाती है।

दूसरी तरफ कमजोर पक्ष अपने कब्जे में गई जमीन वापस न ले पाने के बावजूद अपनी सरकार, संप्रभुता और राजनीतिक अस्तित्व को बचा ले तो वह खुद को पराजित नहीं मानता।

भविष्य के युद्धों का सबसे बड़ा सबक

21वीं सदी में युद्ध शायद पहले से कम निर्णायक और अधिक लंबा होने वाला है।

ड्रोन सस्ते हो रहे हैं, तकनीक तेजी से फैल रही है और गैर-परंपरागत युद्ध के तरीके ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं। आर्थिक दबाव और सूचना युद्ध भी सैन्य अभियानों के साथ चलते हैं।

इसलिए किसी देश की वास्तविक शक्ति केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसके पास कितने टैंक, विमान या मिसाइलें हैं।

असल सवाल यह है कि क्या वह अपनी सैन्य शक्ति को एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य, टिकाऊ रणनीति और स्वीकार्य अंतिम समाधान में बदल सकता है?

युद्ध में विनाश पैदा करना आसान हो सकता है। मुश्किल काम है उस विनाश के बाद ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाना जो लंबे समय तक टिक सके।

आज की दुनिया में शायद सबसे बड़ी सैन्य चुनौती दुश्मन को हराना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि जीत के बाद शांति कैसी होगी।

और यदि इस सवाल का जवाब पहले से मौजूद नहीं है, तो सबसे शक्तिशाली सेना भी युद्ध जीतकर अंततः रणनीतिक रूप से हार सकती है।

— अमर शर्मा
TWM News

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