चुनाव से पहले वोटर लिस्ट संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, पर रोक नहीं
नागरिकता जांच बनाम संवैधानिक प्रक्रिया पर छिड़ी बहस, आधार को साक्ष्य न मानने पर उठे सवाल
नई दिल्ली, 9 जुलाई | ब्यूरो रिपोर्ट
बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मचे राजनीतिक और कानूनी घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन इसके समय पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए।
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का संशोधन संविधान के अनुरूप है, लेकिन इसे चुनावों से ठीक पहले कराए जाने का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।
“काम पर नहीं, समय पर सवाल”
सुनवाई के दौरान जस्टिस धूलिया ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आपका काम गलत नहीं है, लेकिन समय की चुनावी नजदीकी चिंता का विषय है। बिहार में SIR को विधानसभा चुनाव से जोड़ना क्यों जरूरी हो गया? यह काम चुनाव से इतर भी तो किया जा सकता था।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची अंतिम हो जाने के बाद न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जिससे अगर कोई व्यक्ति गलती से बाहर कर दिया गया, तो उसके पास मतदान का संवैधानिक अधिकार खो सकता है।
ECI के तर्क और ‘कंप्यूटराइजेशन’ की दलील
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि सूची के इस संशोधन का उद्देश्य बीते दो दशकों में हुए व्यापक बदलावों को समेटना है, ताकि दोहराव और अवैध नामों को हटाया जा सके। साथ ही बताया गया कि यह पहली बार है जब पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से की जा रही है, इसलिए इसे एक तर्कपूर्ण कदम माना जाना चाहिए।
विपक्ष की आपत्ति: “नागरिकता की स्क्रीनिंग है ये”
कांग्रेस और राजद सहित विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को “चयनात्मक और भेदभावपूर्ण” करार देते हुए इसकी तीखी आलोचना की है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया, “चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार किसने दिया? उन्हें कोई प्रमाण होना चाहिए यह कहने के लिए कि मैं नागरिक नहीं हूं। यह जिम्मेदारी मेरी नहीं, उनकी है।”
आधार को प्रमाण नहीं मानने पर बवाल
एक बड़ा विवाद इस बात पर भी हुआ कि आयोग ने नागरिकता प्रमाण के लिए आधार कार्ड को 11 स्वीकृत दस्तावेजों की सूची से बाहर क्यों रखा है। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “पूरा देश आधार पर निर्भर है और निर्वाचन आयोग उसे ही खारिज कर रहा है।”
इसके जवाब में आयोग की ओर से कहा गया कि आधार सिर्फ पहचान का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। यह विषय गृह मंत्रालय के अधीन आता है, न कि चुनाव आयोग के।
तीन बड़े सवालों पर टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले में चुनाव आयोग से तीन सवालों के जवाब मांगे हैं:
- क्या आयोग अपने अधिकारों का सही उपयोग कर रहा है?
- क्या प्रक्रिया निष्पक्ष और व्यावहारिक है?
- क्या इसका समय चुनावी दृष्टि से उचित है?