नेत्रहीन प्रेम की कहानी या स्क्रिप्ट का दुर्घटनास्थल?
‘आँखों की गुस्ताखियाँ’ ने किया दर्शकों के धैर्य की परीक्षा
कुछ फिल्में रुलाती हैं, कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं, लेकिन ‘आँखों की गुस्ताखियाँ’ वह दुर्भाग्यशाली प्रयोग है जो दर्शकों को खुद की फिल्म देखने की पसंद पर ही सवाल उठाने पर मजबूर कर देती है।
मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड की तीन पृष्ठों की कहानी The Eyes Have It को अवैध रूप से खींच-तानकर दो घंटे की एक बोझिल और तर्कहीन प्रेम-कथा में तब्दील कर दिया गया है।
फिल्म की कहानी मसूरी में रहने वाली एक महत्वाकांक्षी अभिनेत्री शनाया कपूर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक अंधी लड़की की भूमिका के लिए खुद को अंधा बना लेती है—अर्थात आंखों पर पट्टी बांधकर सड़कों पर घूमना शुरू कर देती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात होती है विक्रांत मैसी से, जो एक दृष्टिहीन संगीतकार है।
जहां अभिनय में गंभीरता दिखाने की कोशिश थी, वहीं पटकथा और निर्देशन की लापरवाही ने फिल्म को एक मज़ाक बना दिया।
प्रदर्शन की बात करें तो:
विक्रांत मैसी जैसे संजीदा कलाकार के अभिनय की कदर की जानी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश वह भी इस बेतुकी कहानी में खो जाते हैं। लग रहा था मानो शेक्सपियर को शौकिया नाटक में फंसा दिया गया हो।
वहीं शनाया कपूर की यह फिल्म अभिनय से ज़्यादा ‘नेपोटिज़्म’ के टिकट की तरह लगती है। हालांकि उन्होंने अपना चेहरा डूबने नहीं दिया, लेकिन अभिनय में कोई आत्मा नजर नहीं आई।
निर्देशन व पटकथा:
फिल्म के दृश्य ऐसे कटते हैं जैसे कोई पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन हो। पात्र बीच संवाद में ग़ायब हो जाते हैं, और संवाद—मानो किसी AI बॉट की रिजेक्ट की गई लाइनें हों।
संगीत:
एक ही उदासी भरा ट्रैक, जिसे पांच अलग-अलग तरीकों से रीमिक्स कर फिल्म में घुसाया गया है। दर्शक अंत तक मोबाइल फेंकने की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
क्लाइमैक्स:
जब लगता है कि फिल्म खत्म हो गई है, तब अचानक पात्र यूरोप में टेलीपोर्ट हो जाते हैं—क्यों और कैसे, इसका कोई जवाब नहीं।
निष्कर्ष:
फिल्म की मूल भावना में संवेदना थी, लेकिन उसे जिस ढंग से पर्दे पर उतारा गया, वह किसी नेत्रहीन निर्देशन प्रयास जैसा ही प्रतीत होता है—जहां स्क्रिप्ट को मसूरी की पहाड़ियों से आंखों पर पट्टी बांधकर नीचे फेंक दिया गया हो।
रेटिंग: ⭐ एक तारा सिर्फ विक्रांत मैसी की मेहनत के नाम।
संपादकीय टिप्पणी:
‘आँखों की गुस्ताखियाँ’ आंखों के नहीं, धैर्य के इम्तिहान की कहानी है। युवा प्रतिभाओं के नाम पर ऐसी फिल्मों को थोपना सिनेमा के साथ अन्याय है।