‘मालिक’ की गुंडागर्दी में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘रईस’ का सस्ता मिक्सचर
उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति और अपराध के गठजोड़ पर बनी फिल्म ‘मालिक’ एक बार फिर से वही पुराना किस्सा दोहराती है, जिसमें एक गरीब किसान का बेटा बंदूक उठाकर ‘भाई’ बनता है और सियासी खेल का मोहरा बन जाता है। फिल्म की पृष्ठभूमि 1980 के दशक के अंतिम वर्षों का इलाहाबाद है, जहां दीपक (राजकुमार राव) का किरदार एक ज़मींदार-विरोधी आंदोलन से उठकर अपराध की दुनिया का ‘मालिक’ बन जाता है।
राजकुमार राव ने अपने किरदार में जान डाली है, पर कहानी पहले से देखी-सुनी लगती है। निर्देशक ने किरदार को गहराई देने की कोशिश की है, लेकिन पटकथा में नयापन नहीं है। फिल्म की शुरुआत में इलाका, वर्ग-संघर्ष और जातिगत असंतुलन की बातें उभरती हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह विशुद्ध गैंगस्टर ड्रामा में तब्दील हो जाती है।
राजनीति और अपराध का रिश्ता
फिल्म में राजनेताओं की भूमिका में सौरभ शुक्ला और स्वानंद किरकिरे ने अच्छा काम किया है। दोनों ही अपने-अपने संवादों से फिल्म में यथार्थ का स्वाद भरते हैं, पर फिर भी यह कहानी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की गहराई और ‘रईस’ की चमक को पकड़ने में विफल रहती है। राजनीतिक गठजोड़, बदले की आग और विश्वासघात की परतें पहले भी कई बार देखी जा चुकी हैं।
प्रोसेनजीत की एंट्री बनी रोचक मोड़
फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि बंगाली अभिनेता प्रोसेनजीत चटर्जी हैं, जो एक बुजुर्ग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के किरदार में आते हैं। उनकी शैली, चाल और संवाद अदायगी फिल्म में ताजगी लाते हैं। अंतिम दृश्य में उनका डांस और राजकुमार राव का गुस्सा दर्शकों को सीट से बांधे रखता है।
संगीत और संपादन में कमज़ोरी
संगीतकार सचिन-जिगर का आइटम सॉन्ग और हुमा कुरैशी की प्रस्तुति दमदार है, पर इसका कहानी में कोई ठोस योगदान नहीं दिखता। बैकग्राउंड म्यूज़िक कई बार कहानी से अलग दिशा में चला जाता है। फिल्म की लंबाई, धीमी गति और संपादन की असमानता दर्शकों की परीक्षा लेती है।
प्रेम कहानी और महिला किरदार का बासी दोहराव
गैंगस्टर की प्रेम कहानी को नैतिकता का केंद्र बनाने की पुरानी तकनीक एक बार फिर दोहराई गई है। मानुषी छिल्लर ने प्रेमिका की भूमिका निभाई है, पर उनका किरदार बहुत हद तक पूर्वानुमेय है और कोई खास असर नहीं छोड़ता।
निष्कर्ष
‘मालिक’ एक अच्छी मंशा से बनी फिल्म है, पर इसके पास कहने के लिए नया कुछ नहीं है। कहानी, किरदार और संघर्ष पहले भी बड़े पर्दे पर कई बार दिख चुके हैं। यदि फिल्म का उद्देश्य क्षेत्रीय यथार्थ को दिखाना था, तो उसे और गहराई से दिखाने की जरूरत थी। कुल मिलाकर, फिल्म ‘मालिक’ एक पुरानी कहानी का नया संस्करण है, जिसमें न तो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की धार है, न ‘रईस’ की रफ्तार।
रेटिंग: 2.5/5