नई उड़ान में दम नहीं: ‘सुपरमैन’ की नई फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर उतरी फीकी
✍️ विशेष संवाददाता |
जेम्स गन द्वारा लिखित और निर्देशित ‘सुपरमैन’ की नई फिल्म को लेकर दुनियाभर के दर्शकों में काफी उत्साह था। रिलीज़ के पहले ही दिन सिनेमाघरों में भारी भीड़ उमड़ी, खासकर उन दर्शकों की, जो 1978 की सुपरमैन फिल्म या 90 के दशक की लोकप्रिय टीवी सीरीज़ ‘Lois & Clark’ के प्रशंसक रहे हैं। लेकिन इस बार उम्मीदों का आसमान जितना ऊंचा था, फिल्म का असर उतना ही धरातल पर रहा।
❝सुपरहीरो नहीं, सुपरमार्केट बन गया है ‘सुपरमैन’ का ब्रांड❞
सुपरमैन अब केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक ब्रांड है – जिसमें फिल्में, खिलौने, परिधान और तमाम उत्पाद शामिल हैं। परंतु इस नई फिल्म में न तो कहानी में कोई नई बात है और न ही पात्रों में कोई खास गहराई। डेविड कोरेनस्वेट द्वारा निभाया गया क्लार्क/सुपरमैन लगभग पूरी फिल्म में उसी चमकीले कॉस्ट्यूम में नजर आते हैं, जिससे दर्शकों को न तो भावनात्मक जुड़ाव हो पाता है, न ही कोई मानवीय संकट उभर कर आता है।
🚀 नया क्या है?
नई फिल्म में एकमात्र उल्लेखनीय बात है सुपरमैन का मेटा-ह्यूमन यूनिवर्स से जुड़ाव, जिसमें अब वह अन्य शक्तिशाली प्राणियों के साथ मिलकर दुनिया की मदद करता है – वह भी तब, जब उनका मूड अच्छा हो। एक और नया जोड़ा गया किरदार है ‘क्रिप्टो’ नाम का कुत्ता और एक दर्जन रोबोट्स की टोली, जिन्हें नाम दिए गए हैं – ‘वन’ से लेकर ‘ट्वेल्व’ तक। इनका इस्तेमाल भले ही कहानी में सीमित हो, पर डिज़ाइन और पैकेजिंग ऐसी है कि बच्चों और कलेक्टर्स का ध्यान ज़रूर खींचती है।
📝 राजनीति और तकनीक का सतही स्पर्श
लेखक-निर्देशक जेम्स गन ने कहानी में कॉर्पोरेट और आम इंसानों के टकराव, अंतरराष्ट्रीय तनाव और तकनीकी जार्गन के जरिए समकालीन राजनीतिक सन्देश देने की कोशिश की है, लेकिन यह प्रयास क्लीशे और सतहीपन में डूब जाता है। फिल्म का संवाद और तकनीकी भाषा कई बार अनजाने में हास्यास्पद हो जाती है।
🎭 न किरदार दमदार, न केमिस्ट्री असरदार
डेविड कोरेनस्वेट और रैचेल ब्रोसनहन की जोड़ी ठीक-ठाक है, लेकिन न तो डेविड में क्रिस्टोफर रीव जैसी मासूमियत और करिश्मा है, और न ही रैचेल, टेरी हैचर जैसी मज़ाकिया और आकर्षक लोइस के रूप में उभर पाती हैं। ऐसे में दर्शकों के लिए स्क्रीन पर वह जादू नज़र नहीं आता, जो कभी ‘Lois & Clark’ या शुरुआती फिल्मों में महसूस होता था।
🎞️ होमेज तो हैं, पर क्या समझेगी नई पीढ़ी?
फिल्म में कई जगह पुराने फिल्मों और कॉमिक्स को श्रद्धांजलि देने की कोशिश की गई है – सेट्स, सीन, संवाद और कॉस्ट्यूम्स के ज़रिए। परंतु सवाल यह उठता है कि आज की पीढ़ी, जो डिजिटल युग में पली-बढ़ी है, क्या उन संकेतों और भावनाओं को समझ पाएगी?
📉 निष्कर्ष: चकाचौंध के पीछे खालीपन
जहां एक ओर स्पेशल इफेक्ट्स लाजवाब हैं, वहीं कहानी और भावनात्मक जुड़ाव के नाम पर फिल्म पूरी तरह से निराश करती है। ‘सुपरमैन’ जैसे किरदार से आज की दुनिया को उम्मीद थी – एक उम्मीद जो शायद नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सकती थी। लेकिन यह फिल्म सिर्फ एक और चमकीला, लेकिन खोखला सुपरहीरो प्रोडक्ट बनकर रह जाती है