“एक कट में पूरी कहानी”: एडिटर शिवम धवन का सफर, तकनीक और सोच
लेखक: निहाल दत्ता
पटना से निकलकर कंटेंट क्रिएशन और फिल्म एडिटिंग की दुनिया में अपने हुनर का लोहा मनवाने वाले शिवम धवन आज उभरते हुए फाइन-कट जादूगर हैं। St. Xavier’s College, Patna से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म की पढ़ाई करते हुए ही उन्होंने थ्योरी और प्रैक्टिकल को एकसाथ साधा। क्लासरूम की एडिटिंग मशीनों से शुरू हुआ सफर आज RJ महवेश, मिहिर आहूजा, और क्रिकेटर युज़वेंद्र चहल जैसे चेहरों की रील्स एडिट करने तक आ पहुंचा है।
शिवम ने न सिर्फ शॉर्ट फिल्म्स को एडिट किया है बल्कि हाल ही में रिलीज़ हुई थ्रिलर शॉर्ट फिल्म “Stalker” में उन्होंने एडिटिंग की कमान संभाली, वहीं कंटेंट बेस्ड फिल्म “Charsi” का निर्देशन भी किया।
एडिटिंग सिर्फ कट लगाना नहीं, रिद्म बनाना है
“Editing is like music — right rhythm, right beat, right silence,” शिवम कहते हैं। उनके लिए एडिटिंग महज टाइमलाइन पर क्लिप्स को जोड़ना नहीं है, बल्कि यह एक विज़ुअल ऑर्केस्ट्रा है जिसमें हर कट, ट्रांजिशन, और साउंड इफेक्ट एक भावना को गढ़ता है।
शिवम धवन Adobe Premiere Pro, DaVinci Resolve, और Final Cut Pro जैसे सॉफ्टवेयर में निपुण हैं। लेकिन वो मानते हैं कि टूल्स से ज़्यादा ज़रूरी होती है Visual Sense और Timing।
उनके मुताबिक –
“जब आप किसी सीन को काटते हैं, तो आपको ये समझना होता है कि कौन सी फ्रेम दर्शक के दिमाग में ठहरने वाली है और कब कट करना उसे सबसे ज़्यादा असरदार बनाएगा।”
“Stalker” जैसी फिल्म में Editing कैसे बनी कहानी की धड़कन?
Stalker, एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर, जिसकी हर फ्रेम में सस्पेंस है। शिवम ने इस फिल्म में एडिटिंग को इस तरह से डिजाइन किया कि दर्शकों को एक सेकेंड के लिए भी विचलन ना हो।
- उन्होंने Jump Cuts का इस्तेमाल किया ताकि दर्शकों को नायक की अस्थिर मानसिक स्थिति का अनुभव हो सके।
- साथ ही Slow Dissolves और L-Cuts का प्रयोग किया जिससे नैरेटिव स्मूथ और इन्वॉल्विंग लगे।
- साउंड डिजाइन में उन्होंने Ambience Layering और Reverb Delays जैसे एडवांस्ड टेकनीक्स का इस्तेमाल किया जिससे थ्रिल का असर दुगना हुआ।
Hollywood से आई प्रेरणा, दिल से जुड़ी क्लासिक कटिंग से
शिवम धवन के एडिटिंग के स्टाइल पर Walter Murch (Apocalypse Now), Thelma Schoonmaker (Raging Bull) और Lee Smith (Dunkirk) जैसे हॉलीवुड क्लासिक एडिटर्स की गहरी छाप है।
“मैंने ‘The Godfather’ में जो dissolve transitions देखे, या ‘Fight Club’ में जो pacing है – वो सब मेरे लिए editing schools रहे हैं,” वो बताते हैं।
“Editing में emotion और structure साथ-साथ चलते हैं। ये सर्जरी की तरह है – ज़रा सी चूक कहानी को मार सकती है।”
एक रील, एक सीन और एक सपना
पटना से शुरू हुआ सफर अब सोशल मीडिया से लेकर सिनेमाई स्क्रीन तक फैल चुका है। मिहिर आहूजा की शॉर्ट रील्स से लेकर युज़ी चहल की प्रोमो एडिटिंग तक शिवम हर फ्रेम में एक स्टोरी खोजते हैं।
वो मानते हैं –
“हर शॉट में एक कहानी छिपी होती है। एडिटर का काम है उसे खोलना, सहेजना और दर्शक के सामने उस रूप में पेश करना जिससे वो खुद को उसमें देख सके।”
आगे का रास्ता: कंटेंट क्रिएशन और क्लासिक सिनेमेटिक एडिटिंग का मेल
शिवम का अगला लक्ष्य है एक ऐसा वर्चुअल स्टूडियो बनाना जहां कंटेंट क्रिएटर्स और नए फिल्ममेकर मिलकर एक ऐसा क्राफ्ट तैयार करें जो रील और रियल दोनों को जोड़ता हो।