“जासूसी जगत का जलबोरा: वॉर 2 में गोलियों से ज्यादा छेद कहानी में”

वाईआरएफ के ‘स्पाई यूनिवर्स’ की गाड़ी, जो कभी ‘टाइगर’ की दहाड़ और ‘वॉर’ की धमक से दौड़ रही थी, अब ‘वॉर 2’ के साथ सीधा खाई में जा गिरी। जो फिल्म Hrithik Roshan और Jr NTR की विस्फोटक भिड़ंत का वादा करती थी, वो तीन घंटे का तर्क-विहीन एक्शन-सर्कस साबित हुई, जिसमें प्लॉट से ज्यादा छेद दर्शकों की धैर्य-सीमा में हुए।

कहानी की गुत्थी, जो खुद ही उलझ गई
RAW एजेंट कबीर (ऋतिक रोशन) का ‘रोग’ बनना महज़ एक अंडरकवर चाल है, ताकि ‘काली’ नामक एक रहस्यमयी संगठन को रोका जा सके। लेकिन यह मिशन उन्हें अपने ही गुरु कर्नल लूथरा (अशुतोष राणा) के खिलाफ खड़ा कर देता है। गुरु के निधन के बाद एक ‘एलिट टीम’ बनती है, जिसमें उनकी बेटी काव्या (कियारा आडवाणी) और गुस्सैल सैनिक विक्रम उर्फ रघु (Jr NTR) शामिल होते हैं।
कबीर-रघु का ‘डार्क पास्ट’ हर सीन में रीसेट होता है, जैसे टीवी सीरियल के अगले एपिसोड में “कल जो हुआ, वो भूल जाइए” वाला फॉर्मेट।

लेखन और पटकथा: न मसाला पका, न कहानी पकी
फिल्म की पटकथा ऐसे है जैसे कोई रातभर जागकर अधूरी कॉपी चिपका दे। हर दस मिनट में नया प्लॉट होल, बेमतलब के सबप्लॉट (जैसे नाइना की बेटी वाली कहानी) और जुवेनाइल डिटेंशन सेंटर में RAW भर्ती का आइडिया – मानो पासपोर्ट की जगह गुप्तचर बनने की सुविधा ‘आधार कार्ड’ से मिल रही हो।
‘काली’ नामक संगठन इतनी लापरवाही से लिखा गया है कि खलनायक का डर कब ‘एक्स्ट्रा कलाकार’ में बदल गया, पता ही नहीं चला।

अभिनय और एंट्री: हीरो चमके, तर्क धूमिल
ऋतिक का जापान वाला शाओलिन फाइट सीन स्टाइलिश है, लेकिन स्लो-मो इतना कि दर्शक पॉपकॉर्न खत्म कर लें और सीन फिर भी चलता रहे।
Jr NTR का ड्रोन से लटककर समुद्री डाकू अवतार में उतरना और बिना हथियार के मारपीट – सीधा मीम मैटेरियल। बोनस – तेलुगू में धमकी देना और सामने वाला हिंदी में डरना।
कियारा के स्टंट और गीत-स्नान दृश्य कथानक में उतने ही जरूरी जितना मरुस्थल में छाता। अनिल कपूर की एक्शन शूटिंग में “एक्शन” की कमी, और बाकी किरदार सिर्फ वॉलपेपर।

तकनीकी पक्ष: चमकदार पर जानहीन
कैमरा वर्क ठीक-ठाक, लेकिन एडिटिंग पहली इंट्रो के बाद गिरावट पर। ₹400 करोड़ के बजट में ग्रीन स्क्रीन ऐसे चुभी जैसे शादी में नकली गुलदस्ता।

निर्देशन: आयान मुखर्जी की एक्शन यात्रा का काला अध्याय
रोम-कॉम और ‘स्लाइस ऑफ लाइफ’ के माहिर आयान यहां एक्शन की गली में खो गए। ‘ब्रह्मास्त्र’ की CGI कम से कम आंखों को भ्रमित कर लेती थी, पर ‘वॉर 2’ में तो सच सामने है – और वो भी तकलीफदेह।

निष्कर्ष:
फिल्म का वादा ‘टाइटन्स की भिड़ंत’ का था, लेकिन नतीजा ‘धैर्य की परीक्षा’ बनकर निकला। यह न गिरावट है, न ठोकर – यह सीधा चेहरा पीटने वाली स्थिति है।

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