पटना रंगमंच पर ‘पगला घोड़ा’ ने झकझोरा अंतर्मन
पटना, 31 अगस्त
प्रेमचंद रंगशाला का मंच रविवार की संध्या उस समय साक्षी बना जब रंगकर्मी संस्था रस-रंग ने बादल सरकार के चर्चित नाटक “पगला घोड़ा” का सफल मंचन किया। हिंदी अनुवाद डॉ. प्रतिभा अग्रवाल का और निर्देशन राज कपूर का रहा। दर्शकों से खचाखच भरे सभागार में नाटक ने समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच और मानवीय रिश्तों की जटिलताओं पर गहरी चोट की।

नाटक की कथा एक श्मशान घाट में आत्महत्या कर चुकी युवती की चिता के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ चार पुरुष शराब के नशे में अपने अतीत की प्रेम कहानियों और स्त्रियों के साथ किए गए छल-प्रपंच को याद करते हैं। मृत युवती की आत्मा उनके भीतर दबी सच्चाइयों को उजागर करती है और यह अहसास कराती है कि स्त्रियों की आत्महत्याएँ दरअसल पुरुषों की स्वार्थपरता, झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा और अस्वीकार के हथियारों से हुई अप्रत्यक्ष हत्याएँ हैं। ‘पगला घोड़ा’ इस उथल-पुथल को मानवीय जुनून और संवेदना की तर्कहीनता का प्रतीक रूप में प्रस्तुत करता है।
कलाकारों का सशक्त अभिनय
प्रगति शर्मा ने विभिन्न स्त्री पात्रों (लड़की, लक्ष्मी, मिली, मालती) को जीवंत किया। ब्रजेश शर्मा (कार्तिक), ज़फ्फर आलम (शशि), कुणाल कुमार (सातु) और शशि रंजन ‘भानु’ (हिमाद्री) ने अपनी दमदार अदाकारी से पात्रों की आत्मग्लानि और द्वंद्व को मंच पर साकार किया। सुशील देव ने चांडाल के रूप में गंभीर उपस्थिति दर्ज कराई।
मंच सज्जा और तकनीकी टीम की सराहना
सेट डिजाइन प्रेमचंद महतो का रहा जबकि निर्माण सुनील शर्मा ने किया। ध्वनि संयोजन अजीत कुमार ने सँभाला, मेकअप लाडली राय और पिंकी देवी का रहा। पोस्टर और फ्लेक्स डिजाइन में ज़फ्फर आलम और रोमी सेन का योगदान रहा। मंच संचालन निहाल कुमार सिंह निर्मल ने किया जबकि मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी मनीष महिवाल ने निभाई।

समाज के लिए प्रासंगिक संदेश
निर्देशक राज कपूर ने कहा कि “यह नाटक केवल प्रेम की कहानियों का शोकगीत नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का आईना है। आज भी स्त्रियाँ अपमान और अस्वीकार के बोझ से जूझ रही हैं। ‘पगला घोड़ा’ उन्हें आवाज़ देने का प्रयास है।”