टोलोलिंग की जीत ने पलटा कारगिल युद्ध का रुख, भारतीय सेना को मिली निर्णायक बढ़त
अमर शर्मा की रिपोर्ट
नई दिल्ली, 26 जुलाई।
कारगिल युद्ध (1999) में टोलोलिंग की लड़ाई को भारतीय सेना के लिए निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस दुर्गम और रणनीतिक पहाड़ी पर जीत ने न सिर्फ युद्ध की दिशा बदली, बल्कि आगे की सभी सैन्य सफलताओं की नींव भी रखी।
ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) खुशाल ठाकुर, जिन्होंने 18 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाली थी, ने इस लड़ाई को ‘ऑपरेशन विजय’ का सबसे कठिन और निर्णायक चरण बताया। उन्होंने कहा कि टोलोलिंग पर जीत ने पाकिस्तान की बढ़त को खत्म कर दिया और भारतीय सेना के मनोबल को नई ऊंचाई दी।
16,000 फीट की ऊंचाई पर मौत से मुकाबला
टोलोलिंग की लड़ाई बेहद कठिन परिस्थितियों में लड़ी गई। भारतीय सैनिकों को लगभग 16,000 फीट की ऊंचाई पर माइनस 15 से 20 डिग्री तापमान में सीधी चढ़ाई करते हुए दुश्मन के मजबूत ठिकानों पर हमला करना पड़ा। दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था और मशीनगन, मोर्टार व मिसाइलों से लैस था, जबकि भारतीय सैनिकों के पास सीमित कवर था।
रणनीतिक महत्व: क्यों जरूरी थी यह जीत
टोलोलिंग की चोटी द्रास सेक्टर में स्थित थी और यह राष्ट्रीय राजमार्ग-1A (श्रीनगर-लेह मार्ग) पर नजर रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। इस पर कब्जा होने से दुश्मन भारतीय आपूर्ति मार्ग को बाधित कर सकता था। इसलिए इस क्षेत्र को वापस लेना युद्ध के लिए अत्यंत जरूरी था।
जीत के बाद बदला युद्ध का समीकरण
टोलोलिंग पर कब्जा भारतीय सेना की पहली बड़ी सफलता थी, जिसने पूरे युद्ध का संतुलन बदल दिया।
- पाकिस्तानी सेना का मनोबल गिरा
- भारतीय सेना का आत्मविश्वास बढ़ा
- इसके बाद प्वाइंट 5140 और टाइगर हिल जैसी महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा संभव हुआ
- वीरों का बलिदान और अदम्य साहस
इस लड़ाई में कई भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। कर्नल राजेश अधिकारी, मेजर सरवनन सहित अनेक वीरों की शहादत ने इस जीत को संभव बनाया। वहीं परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव जैसे जवानों की बहादुरी आज भी प्रेरणा देती है।
टोलोलिंग की जीत सिर्फ एक पहाड़ी पर कब्जा नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सेना के साहस, रणनीति और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनी। इसी जीत ने कारगिल युद्ध में भारत की अंतिम विजय की राह प्रशस्त की और इतिहास में एक अमिट अध्याय जोड़ दिया।