हाटे बाजारे : साहित्य, सिनेमा और कटिहार की स्मृतियों का अनमोल अध्याय
राय | साहित्य, संस्कृति और कटिहार की विरासत
कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज स्थान नहीं होते। वे अपनी मिट्टी, स्मृतियों और किस्सों से पहचाने जाते हैं। कटिहार भी ऐसा ही शहर है—रेल की पटरियों, जूट मिलों, महानंदा की हवा, मनिहारी की गंगा और आसपास के बहुभाषी लोकजीवन के बीच विकसित हुई ऐसी भूमि, जिसने साहित्य और संस्कृति को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि जिया है।
कटिहार की साहित्यिक पहचान की चर्चा हो और मनिहारी की धरती से निकले बलाईचंद मुखोपाध्याय ‘बनफूल’ का नाम सामने न आए, यह संभव नहीं। बनफूल केवल बांग्ला के महत्वपूर्ण साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि चिकित्सक भी थे। मनुष्य और उसके जीवन को बेहद करीब से देखने की उनकी दृष्टि ने उनके साहित्य को विशिष्ट बनाया।
उनकी रचनाओं में समाज के बड़े-बड़े विमर्श अक्सर किसी भाषण की तरह सामने नहीं आते। वे किसी साधारण व्यक्ति, छोटे-से प्रसंग, रिश्ते या अप्रत्याशित घटना के माध्यम से जीवन की गहरी सच्चाइयों को सामने रख देते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति थी।
‘हाटे बाजारे’ से साहित्य का लोकजीवन
बनफूल की चर्चित कृतियों में ‘हाटे बाजारे’ का विशेष स्थान है। नाम सुनते ही एक ग्रामीण हाट की तस्वीर उभरती है—लोगों की आवाजाही, दुकानों की हलचल, गरीबी और समृद्धि का अंतर, रिश्तों की जटिलता, प्रेम, करुणा, संघर्ष और मनुष्यता।
यही कारण है कि ‘हाटे बाजारे’ को केवल एक साहित्यिक कृति के रूप में देखना उसके महत्व को सीमित करना होगा। यह अपने समय के ग्रामीण समाज और मानवीय संबंधों को समझने का एक माध्यम भी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संवेदना के पीछे जिस भूगोल की स्मृतियाँ थीं, वह हमारे अपने इलाके का मनिहारी था। यही तथ्य इस रचना को कटिहार और आसपास के लोगों के लिए और अधिक आत्मीय बना देता है।
साहित्य से सिनेमा तक
साहित्य की असली ताकत यही है कि वह अपने मूल माध्यम की सीमाओं को पार कर सकता है। ‘हाटे बाजारे’ के साथ भी यही हुआ।
प्रसिद्ध फिल्मकार तपन सिन्हा ने 1967 में इसी नाम से बांग्ला फिल्म बनाई। फिल्म में अशोक कुमार और वैजयंतीमाला जैसे बड़े कलाकारों ने अभिनय किया। ग्रामीण समाज, एक आदर्शवादी डॉक्टर और अच्छाई-बुराई के संघर्ष को केंद्र में रखकर बनी इस फिल्म ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की और सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त किया।
एक छोटे से इलाके की सामाजिक संवेदना से निकली कहानी का राष्ट्रीय सिनेमा तक पहुँचना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।
लेकिन बनफूल की साहित्यिक यात्रा केवल ‘हाटे बाजारे’ तक सीमित नहीं थी। ‘भुवन सोम’ भी उनकी चर्चित रचनाओं में है, जिस पर मृणाल सेन ने 1969 में प्रसिद्ध फिल्म बनाई। ‘भुवन शोम’ को भारतीय समानांतर सिनेमा के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
‘अग्नि’, ‘द्वार’, ‘त्रिवेणी’, ‘डाना’ और ‘जंगम’ जैसी रचनाओं के साथ उनकी असंख्य लघुकथाओं ने बांग्ला साहित्य में उन्हें विशिष्ट पहचान दी।
जब साहित्य रेल की पटरियों पर उतर आया
‘हाटे बाजारे’ की कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय शायद तब शुरू होता है, जब इस साहित्यिक नाम का रिश्ता भारतीय रेल से जुड़ता है।
‘हाटे बाजारे एक्सप्रेस’—यह नाम अपने आप में साहित्य और भूगोल के अनूठे संबंध का प्रतीक है। कटिहार और बंगाल के बीच चलने वाली ट्रेन के नाम में बनफूल की रचना की स्मृति का होना इस पूरे प्रसंग को और खास बना देता है।
स्थानीय स्रोतों में उल्लेख मिलता है कि 22 नवंबर 1999 को तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कटिहार-सियालदह के बीच इस नाम से ट्रेन सेवा शुरू की थी। समय के साथ ट्रेन के परिचालन और मार्ग में बदलाव हुए हैं, लेकिन ‘हाटे बाजारे’ नाम से जुड़ी साहित्यिक स्मृति आज भी लोगों के बीच जीवित है।
और सच कहें तो ट्रेन की असली खूबसूरती उसके नंबर या समय-सारिणी में नहीं, बल्कि उसके नाम में है।
एक लेखक ने ‘हाटे बाजारे’ लिखा।
एक फिल्मकार ने उसे पर्दे पर उतारा।
कलाकारों ने उसके पात्रों को जीवन दिया।
और भारतीय रेल ने उसी नाम को अपने डिब्बों पर लिखकर हजारों यात्रियों तक पहुँचा दिया।
क्या किसी साहित्यिक कृति के लिए इससे सुंदर सांस्कृतिक यात्रा की कल्पना की जा सकती है?
कटिहार को अपनी साहित्यिक स्मृतियाँ बचानी होंगी
आज जब हम कटिहार की पहचान की बात करते हैं, तो अक्सर रेलवे जंक्शन, व्यापार, बाजार, उद्योग और भौगोलिक स्थिति तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन किसी शहर की पहचान केवल उसकी वर्तमान अर्थव्यवस्था या इमारतों से नहीं बनती। उसकी असली पहचान उसकी स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत में भी होती है।
कटिहार और मनिहारी का साहित्यिक इतिहास इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
यह वह भूगोल है जहाँ बंगला, हिंदी, उर्दू, मैथिली, अंगिका, सुरजापुरी और अनेक लोकभाषाओं की आवाजें एक-दूसरे से मिलती हैं। गंगा, महानंदा और कोसी क्षेत्र का यह बहुसांस्कृतिक जीवन अपने भीतर असंख्य कहानियाँ समेटे हुए है।
ऐसे में बनफूल की स्मृति को केवल किसी पुराने घर, पुस्तक या साहित्यिक चर्चा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा।
नई पीढ़ी को यह बताना जरूरी है कि जिस भूगोल में वे रहते हैं, उसी मिट्टी से ऐसा साहित्यकार निकला जिसकी रचना पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म बनी और जिसकी प्रसिद्ध कृति का नाम भारतीय रेल की यात्रा से जुड़ गया।
अपनी मिट्टी को याद रखना जरूरी है
बनफूल को याद करना केवल एक महान साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह अपनी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को याद करना भी है।
हम अक्सर साहित्य के बड़े नामों को महानगरों से जोड़कर देखते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना और लखनऊ की साहित्यिक परंपराओं पर स्वाभाविक रूप से अधिक चर्चा होती है। लेकिन साहित्य का जन्म केवल महानगरों में नहीं होता।
कभी वह किसी छोटे कस्बे में जन्म लेता है।
कभी किसी हाट की भीड़ में उसे विषय मिलता है।
कभी नदी किनारे बैठा कोई लेखक मनुष्य के चेहरे पढ़ता है।
और कभी वही कहानी किताब से निकलकर सिनेमा और रेलवे तक पहुँच जाती है।
यही ‘हाटे बाजारे’ की सबसे बड़ी विरासत है।
आज जब भी कोई कटिहार से ‘हाटे बाजारे’ ट्रेन पकड़कर बंगाल की ओर जाए, तो कुछ क्षण के लिए उसके नाम को जरूर पढ़े। और अगर बनफूल को और करीब से जानना हो, तो उनकी रचनाओं और उन पर बनी फिल्मों की ओर लौटना चाहिए।
क्योंकि साहित्य केवल किताबों में नहीं रहता।
वह किसी फिल्म में जीवित रहता है।
किसी पुराने घर की दीवारों में साँस लेता है।
किसी बुजुर्ग साहित्यप्रेमी की स्मृति में बचा रहता है।
और कभी-कभी—
कटिहार से गुजरती हुई एक ट्रेन के नाम में भी दौड़ता है।
मनिहारी की उस मिट्टी को शत-शत नमन, जहाँ बनफूल की संवेदना ने आकार लिया। और कटिहार की उस साहित्यिक विरासत को भी प्रणाम, जो हमें यह याद दिलाती है कि महान साहित्य हमेशा महानगरों की ऊँची इमारतों में पैदा नहीं होता।
कभी वह किसी छोटे से कस्बे, किसी हाट, किसी नदी किनारे और अपनी-सी मिट्टी से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुँच जाता है।
बनफूल को याद करना दरअसल अपनी मिट्टी को याद करना है।
और अपनी मिट्टी को याद रखना ही शायद अपनी जड़ों को जीवित रखने का सबसे सुंदर तरीका है।
मनिहारी की उस पावन धरती को नमन, जिसने बनफूल को जन्म दिया—और उस कलम को भी नमन, जिसने साधारण जीवन में छिपी असाधारण मनुष्यता को शब्द दिए। 🙏