‘मिर्जापुर: द मूवी’ रिव्यू: हिंसा, हंसी और नॉस्टेल्जिया भरपूर, लेकिन 3 घंटे 15 मिनट का रनटाइम बना सबसे बड़ी कमजोरी

नई दिल्ली। ‘मिर्जापुर’ की दुनिया को बड़े पर्दे पर देखने का इंतजार कर रहे फैंस के लिए मिर्जापुर: द मूवी निश्चित तौर पर एक मजेदार सिनेमाई अनुभव लेकर आती है। लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद सबसे पहला सवाल यही मन में आता है—“3 घंटे 15 मिनट इसके लिए?”

फिल्म एंटरटेनिंग है, इसमें कोई शक नहीं। गोलियां, गालियां, डार्क ह्यूमर, दमदार डायलॉग्स और थिएटर में सीटियां बजवाने वाले कई पल मौजूद हैं। लेकिन परेशानी यह है कि फिल्म कई जगह एक थिएट्रिकल फिल्म से ज्यादा ‘मिर्जापुर’ सीरीज के एक लंबे और महंगे एपिसोड जैसी महसूस होती है।

कहानी में वापस लौटता है ‘मिर्जापुर’ का पुराना दौर

फिल्म की कहानी सीरीज के पहले सीजन के एपिसोड 6 और 7 के बीच की टाइमलाइन में सेट है। कहानी उस दौर में लौटती है जब बब्बन बाबुआ यादव, यानी रवि किशन, कलीन भैया की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश करते हैं।

यही फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा भी है। पुराने किरदारों और उस दौर की ‘मिर्जापुर’ वाली दुनिया को दोबारा देखना फैंस के लिए जबरदस्त नॉस्टेल्जिया पैदा करता है।

रवि किशन ने लूटी महफिल

रवि किशन फिल्म के सबसे बड़े शो-स्टीलर हैं। बब्बन बाबुआ यादव के किरदार में उनका अंदाज, पागलपन और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को अलग ऊर्जा देता है।

वहीं पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु अपने-अपने किरदारों में ऐसे नजर आते हैं, जैसे उन्होंने इन किरदारों को सिर्फ निभाया नहीं बल्कि उनके अंदर पूरी तरह उतर गए हों।

हालांकि जीतेंद्र कुमार को बबलू पंडित के रोल में कास्ट करना कुछ दर्शकों को मिसकास्टिंग लग सकता है।

स्क्रीनप्ले: मजा है, लेकिन रफ्तार गायब

फिल्म में ‘मिर्जापुर’ के फैंस को लगभग वह सब मिलता है जिसकी वे उम्मीद लेकर थिएटर पहुंचेंगे—दमदार डायलॉग्स, डार्क कॉमेडी, हिंसा, बंदूकें, बैकग्राउंड म्यूजिक और मास मोमेंट्स।

फिल्म में करीब 4-5 ऐसे सीक्वेंस हैं जहां थिएटर का माहौल सचमुच बदल जाता है। BGM और रैप पार्ट्स भी इन सीन्स को और प्रभावशाली बनाते हैं।

लेकिन पहला हाफ वास्तविक टकराव तक पहुंचने में काफी समय लेता है। दूसरे हाफ में भी कहानी कई जगह खिंचती हुई महसूस होती है और ऐसा लगता है कि स्क्रीनप्ले अपनी रफ्तार खो रहा है।

सबसे बड़ी समस्या—फिल्म कम, लंबा एपिसोड ज्यादा

फिल्म की सबसे बड़ी कमी यही है कि यह पूरी तरह से एक थिएट्रिकल एक्सपीरियंस जैसी महसूस नहीं होती।

ऐसा लगता है जैसे ‘मिर्जापुर’ का एक लंबा चैप्टर उठाकर उसे बड़े बजट, बड़े पर्दे और 3 घंटे 15 मिनट के रनटाइम के साथ रिलीज कर दिया गया हो।

नॉस्टेल्जिया इसका USP भी है और कमजोरी भी। पुराने किरदारों को साथ देखकर फैंस खुश होते हैं, लेकिन कहानी में कई जगह वही पुरानी चीजें दोहराए जाने का एहसास भी होता है।

कहानी में चौंकाने वाले मोड़ कम

फिल्म की कहानी बहुत ज्यादा अनप्रेडिक्टेबल नहीं है। कई ट्विस्ट ऐसे हैं जिन्हें दर्शक पहले ही भांप सकते हैं।

यानी फिल्म का मजा कहानी के सरप्राइज से ज्यादा किरदारों, माहौल और एक्शन में है।

गाने और लव एंगल ने बढ़ाया बोझ

फिल्म में कुछ गाने ऐसे लगते हैं जिन्हें सिर्फ इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि यह एक फिल्म है और फिल्म में गाने होने चाहिए।

वहीं रवि किशन और सोनल चौहान का लव एंगल भी कहानी में जबरदस्ती जोड़ा हुआ महसूस होता है। यह ट्रैक न तो कहानी को खास आगे बढ़ाता है और न ही किरदारों में कोई जरूरी गहराई जोड़ता है।

क्लाइमैक्स में फिर लौटती है ‘मिर्जापुर’ वाली आग

शुक्र है कि क्लाइमैक्स फिल्म की रफ्तार और एनर्जी को वापस ले आता है। भरपूर गोलियां, कुछ अनुमानित ट्विस्ट और रवि किशन और अली फजल के बीच हाथापाई वाला सीक्वेंस फिल्म के अंत को काफी मजेदार बना देता है।

यह वही पागलपन है जिसके लिए ‘मिर्जापुर’ के फैंस थिएटर तक आए हैं।

फाइनल वर्डिक्ट

अगर आप ‘मिर्जापुर’ के कट्टर फैन हैं, तो फिल्म आपको निश्चित तौर पर एंटरटेन करेगी। पुराने किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना, डायलॉग्स पर थिएटर की प्रतिक्रिया और हिंसा-ह्यूमर का मिश्रण आपके लिए पैसा वसूल हो सकता है।

लेकिन अगर आपने सीरीज नहीं देखी है या आप ‘मिर्जापुर’ के फैन नहीं हैं, तो यह फिल्म आपको उतनी प्रभावित नहीं करेगी।

‘मिर्जापुर: द मूवी’ हिंसक है, मजेदार है, नॉस्टेल्जिक है और एंटरटेनिंग भी है। लेकिन 3 घंटे 15 मिनट के बाद एक सवाल बार-बार दिमाग में आता है—

“भाई… इसका एक टाइट 2 घंटे का कट बना देते तो?”

रेटिंग

फैंस के लिए: 3/5

नॉन-फैंस के लिए: 2/5

आपने ‘मिर्जापुर: द मूवी’ देखी? क्या आपको भी इसका रनटाइम जरूरत से ज्यादा लंबा लगा, या फिर ‘मिर्जापुर’ का यह एक्सपीरियंस 3 घंटे 15 मिनट का हकदार था?

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