डिजिटल दुनिया का अंधेरा: लाइक्स के जाल में उलझती युवा पीढ़ी
इंस्टाग्राम फॉलोअर्स घटने से दुखी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मिषा अग्रवाल ने की आत्महत्या, समाज को सोचने पर मजबूर करती सच्चाई
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ आत्ममूल्य को “लाइक्स” और “फॉलोअर्स” से आँका जाता है। प्यार की जगह ‘एंगेजमेंट रेट’ और आत्म-संतोष की जगह आभासी ताली बजाने वालों की संख्या ने ले ली है। हाल ही में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मिषा अग्रवाल की आत्महत्या ने इस डिजिटल अंधेरे की सच्चाई को एक बार फिर सामने ला दिया है।
महज 25वें जन्मदिन से दो दिन पहले मिषा ने अपनी जान दे दी। वजह? इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की संख्या घटना।
3.5 लाख फॉलोअर्स वाली मिषा का सपना एक मिलियन फॉलोअर्स का था। उनके फोन की वॉलपेपर पर वही सपना दर्ज था। लेकिन जब फॉलोअर्स घटने लगे, तो उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पर चोट पहुँची, जिसे वे सह नहीं सकीं।
वेलिडेशन का जाल और खोती पहचान
मिषा की मौत अकेली घटना नहीं है। यह उस सामाजिक महामारी की पहचान है, जिसमें युवा वर्ग वर्चुअल दुनिया की तालियों में आत्म-संवेदना खोजने लगा है। हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ फोन की स्क्रीन से निकला डोपामिन खुशी का भ्रम देता है, लेकिन अंदर ही अंदर खोखलापन और अवसाद भरता चला जाता है।
सिर्फ मिषा नहीं, पिछले कुछ वर्षों में कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, ट्रैवल ब्लॉगर और स्टंट परफॉर्मर ‘परफेक्ट क्लिक’ के लिए जान गंवा चुके हैं — कोई पहाड़ की चोटी से लटकते हुए, कोई गगनचुंबी इमारत की छत पर सेल्फी लेते हुए।
कनेक्टेड लेकिन अकेले
विचारणीय यह है कि जितना हम डिजिटली जुड़ रहे हैं, उतना ही भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। अकेलापन अब लोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि आत्म-संवाद की कमी बन गई है। स्मार्टफोन और इंटरनेट ने जीवन आसान किया है, पर आत्मा को जटिल बना दिया है।
नवजवानों के लिए यह ‘वर्चुअल असलियत’ बेहद खतरनाक साबित हो रही है। जितनी जल्दी स्क्रीन पर थंब्स अप आता है, उतनी ही जल्दी भीतर शून्यता बढ़ती जाती है। यह एक ऐसा नशा है, जिसका डोप हर ‘लाइक’, हर ‘रिएक्शन’ में छुपा है।
डिजिटल डिप्रेशन की महामारी
अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया की लत ने किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की दर को कई गुना बढ़ा दिया है। बॉडी शेमिंग, ईटिंग डिसऑर्डर, अनिद्रा, चिंता, और आत्महत्या की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट बताती है कि जो किशोर प्रतिदिन तीन घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं, उनमें अवसाद और चिंता का स्तर कहीं अधिक होता है।
दूसरों की सजाई-संवरी जिंदगी देखकर अपनी असल जिंदगी फीकी लगने लगती है। यह ‘कम्पेयरिजन ट्रैप’ युवाओं को अंदर ही अंदर खा जाता है।
फिल्मों में उभरता दर्द
सिनेमा भी अब इस सच्चाई को उजागर करने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में इरफान खान के बेटे बाबिल खान की फिल्म ‘लॉग आउट’ ने इस विषय को गंभीरता से उठाया है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है, जो सोशल मीडिया की दुनिया में आत्म-संवेदनाओं की हत्या को बखूबी दर्शाता है।
फिल्म में बाबिल एक ऐसे युवक की भूमिका में हैं, जो मोबाइल की लत और आभासी दुनिया की पहचान के बीच अपनी असली पहचान खो बैठता है। यह फिल्म वर्तमान समय की उस बेचैनी को दर्शाती है जहाँ आत्म-प्रेम, दूसरों की प्रतिक्रिया की भेंट चढ़ जाता है।
क्या करना होगा जरूरी?
इस डिजिटल संकट से निपटने के लिए अभिभावकों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को यह समझाना होगा कि असली जीवन में कठिन काम करने से मिलने वाली खुशी ज्यादा स्थायी होती है। और, वर्चुअल ताली बजाने वाले ‘लाइक्स’ से अधिक मूल्यवान हैं वो रिश्ते जो हमें हमारी पहचान देते हैं।
हमें यह बात सामान्य करनी होगी कि आत्म-मूल्य दूसरों की राय पर नहीं, खुद की सोच और संघर्षों पर आधारित होना चाहिए। ऑनलाइन तारीफें सिर्फ लम्हों की बात होती हैं, लेकिन खुद से की गई सच्ची दोस्ती जीवनभर साथ निभाती है।
निष्कर्ष
अब समय आ गया है कि हम “ऑनलाइन वेलिडेशन” की संस्कृति को रोके और “इमोशनल वेल-बीइंग” को बढ़ावा दें। एक ऐसी जिंदगी जिसमें हम किसी की ‘फीड’ नहीं, अपने मन की ‘शांति’ खोजें। क्योंकि लाइक्स से जिंदगी नहीं चलती — प्यार, समझ, और आत्मसम्मान से चलती है।
(लेखक अमर शर्मा एक स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल समाजशास्त्र के विशेषज्ञ हैं)