नीतीश उपराष्ट्रपति नहीं बनेंगे, भाजपा के पास कई चेहरे—धनखड़ को लेकर भी अटकलें बेमानी
विशेष विश्लेषण | नई दिल्ली से
देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है। विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष तक की निगाहें अब नए उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर टिकी हैं। इन अटकलों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम भी उछाला गया है, लेकिन भाजपा के रणनीतिक मिज़ाज और संघ की विचारधारा को देखते हुए यह कयास कहीं से भी ठोस नहीं जान पड़ता।
दरअसल, भाजपा के लिए यह समय नीतिगत और राजनीतिक दोनों ही दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है। नीतीश कुमार को बिहार से केंद्र की राजनीति में लाकर उपराष्ट्रपति बनाना भाजपा के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। बिहार की सियासत में नीतीश का क्लीन और संयमित चेहरा आज भी पिछड़े वर्गों में विश्वसनीयता का प्रतीक है, और यही वजह है कि राजद के ‘पिछड़ा कार्ड’ के जवाब में भाजपा उन्हें निष्क्रिय करने का जोखिम मोल नहीं लेगी।
इसके अतिरिक्त, नीतीश कुमार की उम्र और हालिया स्वास्थ्य स्थितियों को देखें तो यह भी स्पष्ट है कि मोदी-शाह की टीम उन्हें ऐसी संवैधानिक भूमिका में नहीं लाना चाहेगी जिसमें लगातार सक्रियता अपेक्षित हो। याद रहे, जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति इसलिए चुना गया था क्योंकि वो मुखर और प्रखर रूप में अपनी भूमिका निभा सकते थे। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर ओम बिरला को दोबारा मौका इसी वजह से दिया गया क्योंकि वे युवा और जीवंत हैं।
भाजपा में चेहरों की कोई कमी नहीं
भाजपा और संघ की राजनीति में पहले से ही ऐसे कई नेता हैं जो संगठन और विचारधारा दोनों से आते हैं। यदि भाजपा को कोई ‘बाहरी’ चेहरा चुनना ही है तो केरल के राज्यपाल और अनुभवी मुस्लिम नेता आरिफ मुहम्मद खान इस पद के लिए अधिक उपयुक्त माने जा सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा पार्टी आलाकमान के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शुमार किए जाते हैं और दिल्ली की सत्ता की परिक्रमा करने वालों के अनुसार वे ‘फेवरिट’ हैं।
क्या धनखड़ भाजपा अध्यक्ष बनेंगे?
कुछ सियासी विश्लेषकों ने यह संभावना भी जताई है कि उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद जगदीप धनखड़ को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। लेकिन यह अनुमान भी बहुत कमजोर है। भाजपा में संगठनात्मक पदों के लिए वह नेता प्राथमिकता पाता है जो पार्टी के जमीनी ताने-बाने से वर्षों से जुड़ा हो। धनखड़, हालांकि प्रभावशाली वक्ता हैं और संसद में विपक्ष को जवाब देने में माहिर रहे हैं, लेकिन वे पार्टी संगठन में उस स्तर की सक्रियता नहीं रखते जो अध्यक्ष पद के लिए आवश्यक है।
उपर से, यदि कोई व्यक्ति ‘स्वास्थ्य कारणों’ से संवैधानिक पद से इस्तीफा देता है तो वही व्यक्ति कैसे पार्टी जैसे सक्रिय संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है? यही वजह है कि मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल आगे बढ़ाया गया है—इसका सीधा मतलब है कि भाजपा फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन के मूड में नहीं है।
क्या धनखड़ को भविष्य में राष्ट्रपति बनाया जा सकता है?
यह जरूर कहा जा सकता है कि यदि धनखड़ स्वस्थ रहते हैं, तो 2027 में राष्ट्रपति पद की दौड़ में उनका नाम शामिल किया जा सकता है। भाजपा की रणनीति हमेशा सामाजिक समीकरणों को साधने की रही है—रामनाथ कोविंद को दलित चेहरा और द्रौपदी मुर्मू को जनजातीय महिला के रूप में आगे लाया गया। ऐसे में जाट समुदाय से आने वाले धनखड़ भाजपा के लिए राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त विकल्प हो सकते हैं, खासकर जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में यह समुदाय प्रभाव रखता है।
नए उपराष्ट्रपति को मिलेगा पूरा कार्यकाल
अब जब धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया है और उनका दो वर्षों का कार्यकाल शेष था, तो संविधान के अनुसार नया उपराष्ट्रपति पूरे पांच साल के लिए पद ग्रहण करेगा। संसद का मॉनसून सत्र जारी है और इसी दौरान उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया भी निर्विघ्न पूरी हो सकती है।
फिलहाल भाजपा के पास चेहरों की कोई कमी नहीं है। ऐसे में बाहर से किसी बड़े नाम को लाकर उसे उपराष्ट्रपति बनाना न तो रणनीतिक दृष्टि से मुफीद है और न ही राजनीतिक रूप से तर्कसंगत।