बिहार में शराबबंदी के बाद नया जहर: कोडीन सिरप और स्मैक की जकड़ में युवा

पटना। बिहार में 2016 में लागू शराबबंदी को लेकर सरकार ने दावा किया था कि इससे गांव-गांव नशामुक्त हो जाएंगे। लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग तस्वीर बयां कर रही है। शराब बंद होने के बाद नशे का नया जाल फैल चुका है। अब बच्चों और युवाओं की जेब में शराब की बोतल नहीं बल्कि कोडीन सिरप और स्मैक दिखाई दे रहा है।

शराबबंदी के बाद बढ़ा नशे का कारोबार

गांव, कस्बों और मोहल्लों में कोडीन सिरप और स्मैक का अवैध कारोबार तेजी से पैर पसार रहा है। दवा के नाम पर परोसा जा रहा यह जहर युवाओं को धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में ले रहा है। जहां शराबबंदी का उद्देश्य समाज सुधार और नशामुक्ति था, वहीं अब इसकी जगह नए खतरनाक नशे ने समाज को खोखला करना शुरू कर दिया है।

समाज पर गहरा असर

  • परिवार तबाह: माता-पिता अपने बच्चों को इस लत से छुड़ाने में बेबस नज़र आ रहे हैं।
  • गांव का माहौल बिगड़ा: चोरी-चकारी और आपसी झगड़ों की घटनाएं बढ़ी हैं।
  • युवा बरबाद: शिक्षा और रोजगार छोड़कर नई पीढ़ी नशे की गिरफ्त में जा रही है।

गंभीर सवाल

  1. शराबबंदी के बाद कोडीन सिरप और स्मैक का जाल इतनी आसानी से कैसे फैल गया?
  2. पुलिस और प्रशासन की नज़र से यह नेटवर्क कैसे बच निकलता है?
  3. जब सरकार नशामुक्त समाज का दावा कर रही है तो यह जहर गांव-गांव तक क्यों और कैसे पहुँच रहा है?

खतरे की घंटी

सच्चाई यह है कि शराब तो बंद हो गई, लेकिन नशा खत्म नहीं हुआ। उसका रूप बदल गया और अब यह और भी खतरनाक हो चुका है। यदि सरकार और प्रशासन ने इस पर तुरंत रोक नहीं लगाई, तो आने वाली पीढ़ी अंधकार की ओर धकेल दी जाएगी.

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