बिहार में SIR प्रक्रिया पर कांग्रेस ने उठाए पांच बड़े सवाल, लोकतंत्र को बताया खतरे में
बिहार में चल रही मतदाता सूची की विशेष तीव्र पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया पर कांग्रेस ने गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे संविधान और कानून की भावना के खिलाफ बताया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने शनिवार को प्रेस वार्ता में इस प्रक्रिया पर पांच ठोस आपत्तियां दर्ज कराई और चुनाव आयोग के इस कदम को लोकतंत्र के लिए “खतरनाक और विचित्र” बताया।
पहली आपत्ति : नागरिकता का बोझ मतदाता पर क्यों?
सिंघवी ने बताया कि चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि 2003 से पहले मतदाता सूची में शामिल नामों को तो यथावत रखा जाएगा, लेकिन 2003 के बाद जो नाम जोड़े गए हैं उन्हें ‘संदिग्ध मतदाता’ की श्रेणी में डाल दिया जाएगा। इन मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी, वरना उनका नाम सूची से हटा दिया जाएगा। सिंघवी ने कहा, “नागरिकता साबित करने का भार आयोग पर होना चाहिए, न कि नागरिक पर। यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है।”
दूसरी आपत्ति : दस्तावेजों की त्रिस्तरीय बाध्यता
दूसरे बिंदु पर सिंघवी ने बताया कि 2003 के बाद जुड़े मतदाताओं को तीन श्रेणियों में बांटा गया है और हर वर्ग के लिए अलग-अलग दस्तावेजों की मांग की जा रही है। कहीं खुद का जन्म प्रमाण पत्र, कहीं माता-पिता का, तो कहीं दोनों का। “यदि व्यक्ति यह कागजात नहीं दे पाया, तो नाम सूची से हटा दिया जाएगा। यह अनुचित और अमानवीय है,” उन्होंने कहा।
तीसरी आपत्ति : विधायी अनुमति के बिना आदेश?
सिंघवी का तीसरा सवाल इस पूरी प्रक्रिया के प्रशासनिक आदेश के जरिए चलाए जाने को लेकर था। उन्होंने कहा कि बिना किसी विधायी बदलाव के नागरिकता की जांच का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं है। यह सीमा का अतिक्रमण है।
चौथी आपत्ति : सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना
उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि पहले से सूची में शामिल मतदाताओं का नाम बिना उचित न्यायिक प्रक्रिया के हटाया नहीं जा सकता। “फिर भी बिहार में आयोग सीधे प्रशासनिक आदेश के जरिए इस सुरक्षा को दरकिनार कर रहा है, और वह भी जल्दबाज़ी में।”
पांचवीं आपत्ति : लोकतंत्र की आत्मा पर हमला
सिंघवी ने सबसे गंभीर चिंता यह जताई कि इससे करीब 5 करोड़ मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। “अगर इनमें से 2 करोड़ को भी मतदान से वंचित कर दिया गया, तो क्या यह चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र रहेगा?” उन्होंने पूछा।
उन्होंने चेतावनी दी कि यह पूरी प्रक्रिया न सिर्फ लोकतंत्र की जड़ों पर चोट है, बल्कि संविधान की मूल संरचना को भी खतरे में डालती है। “भारत के चुनावों की निष्पक्षता इसी पर टिकी है कि सभी को समान अवसर मिले। यह पूरी प्रक्रिया असमानता और शंका की भूमि तैयार कर रही है।”
इस पूरे मुद्दे को लेकर बिहार की सियासत गरमा गई है। विपक्षी दलों ने इसे “INDIA गठबंधन के खिलाफ सुनियोजित साजिश” करार दिया है, जबकि चुनाव आयोग ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।