‘तू मेरी, मैं तेरा…’ : चमकदार पैकेजिंग में परोसी गई खोखली रोमांटिक थकान

बॉलीवुड की नई रोमांटिक कॉमेडी ‘तू मेरी, मैं तेरा, मैं तेरा, तू मेरी’ सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई है, लेकिन दर्शकों के दिल तक पहुँचने से पहले ही अपनी ही दोहराव भरी कहानी में उलझती नजर आती है। फिल्म का शीर्षक जितना भ्रमित करता है, कथानक भी लगभग उसी राह पर चलता दिखाई देता है।

फिल्म खुद को 90 के दशक की रोमांटिक फिल्मों की यादों और जेन-ज़ी स्टाइल के मेल के रूप में पेश करती है, लेकिन यह प्रयोग सतह से आगे नहीं बढ़ पाता। कहानी में न तो भावनात्मक गहराई है और न ही किरदारों के बीच कोई ठोस जुड़ाव। प्रेम कहानी अचानक शुरू होती है और बिना किसी ठहराव के आगे बढ़ जाती है, जिससे दर्शक खुद को उससे जोड़ नहीं पाता।

संवादों की बात करें तो वे अक्सर सोशल मीडिया के हल्के-फुल्के जुमलों जैसे लगते हैं, जो गंभीर दृश्य में भी असर नहीं छोड़ पाते। गीत-संगीत फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरता है—गीत न सिर्फ अनावश्यक लगते हैं, बल्कि चल रही कहानी की गति को भी तोड़ देते हैं।

अभिनय के मोर्चे पर कार्तिक आर्यन अपने पुराने अंदाज़ से बाहर निकलते नहीं दिखते, जबकि नीना गुप्ता का अभिनय कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाता है। जैकी श्रॉफ अपनी सीमित भूमिका में संतुलित नजर आते हैं। आश्चर्यजनक रूप से, अनन्या पांडे फिल्म का सबसे सहज पक्ष साबित होती हैं, हालांकि उन्हें भी कमजोर पटकथा का सामना करना पड़ता है।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टाइलिंग और लोकेशन हैं। खूबसूरत कपड़े, विदेशी लोकेशन और ग्लॉसी फ्रेम्स जरूर आकर्षित करते हैं, लेकिन जब कहानी कमजोर हो, तो केवल दृश्य वैभव फिल्म को नहीं बचा सकता।

कुल मिलाकर, ‘तू मेरी, मैं तेरा, मैं तेरा, तू मेरी’ एक ऐसी फिल्म बनकर रह जाती है जो नए प्रयोग का दावा तो करती है, लेकिन पुराने सांचे से बाहर नहीं निकल पाती। यह न तो यादगार प्रेम कहानी बन पाती है और न ही हल्की-फुल्की मनोरंजन फिल्म के रूप में संतोष देती है।

फैसला: अगर आप सिर्फ फैशन और चमक-दमक के लिए सिनेमा देखते हैं, तो एक बार कोशिश कर सकते हैं। मजबूत कहानी और भावनात्मक जुड़ाव की तलाश में जाने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म निराशा ही छोड़ती है।

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