हर रक्षाबंधन पर जवानों को याद करती हैं ‘राखी अम्मा’ रेवती — 87 वर्ष की उम्र में भी देश के सैनिकों को भेजती हैं हजारों राखियाँ
कोयंबटूर में 1998 के बम धमाकों के बाद शुरू हुई ये पहल, अब बन चुकी है एक राष्ट्रीय भावना का प्रतीक
चेन्नई,
जब देश की बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं, तब एक बुज़ुर्ग मां जैसी महिला भी हैं, जो दूर सरहदों पर खड़े हमारे रक्षकों को हर साल हजारों राखियाँ भेजती हैं। चेन्नई की 87 वर्षीय रेवती गणेशन पिछले 27 वर्षों से हर रक्षाबंधन पर भारतीय सैनिकों को राखियाँ भेज रही हैं — और ये सिर्फ धागे नहीं, बल्कि आशीर्वाद, दुआएं और ममता के प्रतीक हैं।
एक भावुक शुरुआत बनी आज देश की मिसाल
1998 में जब कोयंबटूर शहर बम धमाकों से दहला, तब रेवती पहली बार सेना के जवानों को शहर की गलियों में तैनात देख भावुक हो गईं। उन्होंने महसूस किया कि ये जवान केवल सरहदों पर ही नहीं, संकट के समय शहरों की भी रक्षा करते हैं। उसी समय उन्होंने निर्णय लिया कि वे इन जवानों को राखी भेजकर अपना आभार व्यक्त करेंगी।
उस वर्ष उन्होंने स्वयं जाकर जवानों को राखी बाँधी और एक सैनिक की आंखों में छलकते आंसुओं ने उन्हें जीवन भर के लिए प्रेरित कर दिया। “उस जवान की भीगी आंखें आज भी मेरी यादों में हैं,” रेवती बताती हैं।
हर राखी में होती है श्रद्धा, सिंदूर और सन्देश
रेवती की बनाई हर राखी के साथ एक लिफाफे में ‘कुंकुम’, ‘विभूति’ और एक आत्मीय हस्तलिखित पत्र होता है, जिसमें लिखा होता है — “आप भूले नहीं गए हैं।”
हर साल वे मार्च से ही राखियाँ बनाना शुरू कर देती हैं, जिसमें कुछ विशेष बच्चों और करीबी लोगों की मदद शामिल रहती है। इस वर्ष उन्होंने 5,000 से अधिक राखियाँ तैयार की हैं।
खर्चा खुद उठाती हैं, मदद मिलती है दिल से
हालांकि कुछ लोग सहयोग करते हैं, लेकिन अधिकांश खर्च रेवती और उनके पति स्वयं वहन करते हैं। उनका मानना है कि यह खर्च उन मुस्कानों और भावनाओं के आगे कुछ भी नहीं जो इन राखियों के ज़रिए सरहद पर तैनात जवानों तक पहुँचती हैं।
रेवती को कभी यह चिंता थी कि क्या गैर-हिंदू जवानों को यह परंपरा सही लगेगी, लेकिन एक नेवी ऑफिसर मित्र ने कहा — “भारतीय सेना एक परिवार है, जो मज़हब से नहीं, कर्तव्य से जुड़ा है।”
रेवती की राखियाँ — एक भावना, एक प्रार्थना
चाहे सियाचिन की बर्फीली चोटियाँ हों या राजस्थान की तपती रेती, रेवती की राखियाँ उन सैनिकों तक पहुंचती हैं जो अक्सर त्योहारों में अकेले होते हैं। उनकी राखी एक सूत्र है — जो याद दिलाता है कि देश उन्हें याद करता है, उन्हें सराहता है।
रेवती का सपना है — “एक दिन ऐसा आए जब हर जवान की कलाई पर कोई राखी ज़रूर हो”
उनकी यह भावना आज केवल एक महिला की पहल नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा बन चुकी है, जो भारत की आत्मा को दर्शाती है — एकता, सम्मान और ममता का वह धागा जो हर सैनिक को यह एहसास दिलाता है कि वो अकेला नहीं है।