जॉली एलएलबी 3 की कोर्टरूम जंग: दो जॉली आमने-सामने, दर्शकों ने दी मिश्रित प्रतिक्रिया

टीडब्ल्यूएम न्यूज़ फिल्म डेस्क

लंबे इंतजार के बाद जॉली एलएलबी 3 सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत रही कि इस बार दर्शकों को दो जॉली एक ही अदालत में देखने को मिले – अक्षय कुमार और अरशद वारसी। दोनों की टक्कर ने दर्शकों को उत्साहित तो किया, लेकिन क्या फिल्म उम्मीदों पर खरी उतरी, यह सवाल अब भी बना हुआ है।

कहानी का मुद्दा – किसान बनाम जबरन भूमि अधिग्रहण
निर्देशक सुभाष कपूर ने इस बार फिल्म की पटकथा को एक संवेदनशील और सामयिक विषय से जोड़ा है। कहानी जनकी अम्मा (सीमा बिस्वास) की लड़ाई से शुरू होती है, जो एक साधारण ग्रामीण महिला है और ताकतवर उद्योगपति हरिभाई खेतान (गजराज राव) से न्याय मांग रही है। केस जॉली नंबर 1 (अरशद वारसी) से जॉली नंबर 2 (अक्षय कुमार) के पास जाता है और फिर अदालत की बहसें शुरू होती हैं। धीरे-धीरे दोनों प्रतिद्वंद्वी जॉली न्याय के लिए एकजुट हो जाते हैं।

लंबाई बनी कमजोरी
करीब 160 मिनट की यह फिल्म कई जगह बोझिल हो जाती है। कोर्टरूम सीक्वेंस धारदार और प्रभावशाली हैं, लेकिन अदालत से बाहर की घटनाएं खींची हुई लगती हैं। बीच-बीच में जो दंगे, हाथापाई और यहां तक कि जज त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) की प्रेमकहानी जैसे दृश्य जोड़े गए हैं, वे कहानी को कमजोर ही करते हैं।

अंतिम 20 मिनट – फिल्म का सुनहरा पहलू
फिल्म का आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा दमदार है। यहां अक्षय कुमार की जोशीली बहस और अरशद वारसी की वापसी दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर देती है। क्लाइमैक्स भावुक भी है और असरदार भी।

अभिनय परफॉर्मेंस

  • अक्षय कुमार पूरी तरह छा जाते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग और क्लाइमैक्स का भाषण दर्शकों को रोमांचित करता है।
  • अरशद वारसी पहले आधे हिस्से में दबे रहते हैं, लेकिन अंत में दमदार वापसी करते हैं।
  • सौरभ शुक्ला फिर से जज त्रिपाठी के रूप में जमते हैं, हालांकि रोमांटिक एंगल अनावश्यक लगता है।
  • गजराज राव खलनायक के रूप में प्रभावशाली हैं।
  • सीमा बिस्वास सादगी से किरदार को जीवंत करती हैं।
  • राम कपूर, अमृता राव और हुमा कुरैशी का योगदान सीमित है।

तकनीकी पक्ष
फिल्म का सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन संतुलित है, लेकिन एडिटिंग सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई। संगीत प्रभावहीन है और कॉमेडी के रंग पिछली कड़ियों जैसी नहीं हैं।

पॉजिटिव पक्ष

  • अक्षय–अरशद की केमिस्ट्री
  • सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण विषय
  • भावनात्मक क्लाइमैक्स

निगेटिव पक्ष

  • लंबी रनटाइम
  • कमजोर संपादन
  • अनावश्यक उपकथाएं
  • औद्योगिकीकरण को एकतरफा दोषारोपण

अंतिम फैसला
सुभाष कपूर ने एक जरूरी सामाजिक मुद्दे को उठाया है, लेकिन फिल्म कई बार अपने ही बोझ तले दबती नजर आती है। बावजूद इसके, दो जॉली की कोर्टरूम टक्कर दर्शकों को मनोरंजन और सोचने का मौका देती है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐


 

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