मिथिला की सांस्कृतिक विरासत की संरक्षिका रहीं महारानी कामसुंदरी देवी, स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगी
दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया। उनके साथ ही 491 वर्षों से चली आ रही दरभंगा राज की एक ऐतिहासिक कड़ी पूर्ण हुई, लेकिन उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षणिक विरासत मिथिला की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी।
परिवारिक सूत्रों के अनुसार, महारानी कामसुंदरी देवी लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उन्होंने अपने आवास कल्याणी निवास में शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। वे 96 वर्ष की थीं। उनके निधन से मिथिला क्षेत्र में शोक के साथ-साथ उनके योगदान को याद करते हुए श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।
महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा के अंतिम महाराजा महाराजा कामेश्वर सिंह की पत्नी थीं। वे निसंतान थीं, लेकिन उन्होंने अपने जीवन को मिथिला की संस्कृति, शिक्षा और परंपराओं के संरक्षण को समर्पित कर दिया। शाही वैभव से दूर रहते हुए उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन जिया और समाजसेवा को प्राथमिकता दी।
उन्होंने कल्याणी फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। दरभंगा में स्थापित पुस्तकालय और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में उनकी भूमिका को आज भी विद्वान और शोधार्थी सम्मान के साथ याद करते हैं।
महारानी के निधन पर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जगत की कई हस्तियों ने गहरी संवेदना व्यक्त की है। सभी ने उन्हें मिथिला की गरिमा, शालीनता और परंपरा की प्रतीक बताया।
महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार पारंपरिक शाही रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा। उनके जाने से भले ही दरभंगा राज का युग इतिहास बन गया हो, लेकिन मिथिला की सांस्कृतिक चेतना में उनका योगदान सदैव अमर रहेगा।