‘वोट चोरी’ की कहानी कांग्रेस को ही भारी, एनडीए को मिला बड़ा राजनीतिक लाभ
अमर शर्मा

पटना।
बिहार चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस जिस तरह लगातार ‘वोट चोरी’ के आरोप दोहरा रही है, उसका सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा एनडीए को मिलता दिख रहा है। हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस के इस नैरेटिव पर उसके सहयोगी दल—खासतौर पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी)—भी सहमत नहीं थे। महागठबंधन के भीतर कई नेता चाहते थे कि चुनाव प्रचार का फोकस नीतीश सरकार की नाकामियों और 20 साल की ‘नीतीश थकान’ पर रखा जाए, न कि ठोस आधारहीन आरोपों पर।

लेकिन कांग्रेस के इस अभियान ने मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाकर पूरा विमर्श ‘वोट चोरी’ पर केंद्रित कर दिया, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला।


कांग्रेस का ध्यान असली मुद्दों से भटका, एनडीए ने पाए राजनीतिक अंक

कांग्रेस जब तक हार के असली कारणों पर आत्ममंथन करने के बजाय ‘वोट चोरी’ जैसे बहानों की ओट लेती रहेगी, तब तक एनडीए को लाभ मिलता रहेगा। यही वजह है कि राहुल गांधी का हरियाणा चुनावों को लेकर किया गया तथाकथित “हाइड्रोजन बम खुलासा” भी बिहार में कोई प्रभाव नहीं छोड़ सका।

चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस महासंचार प्रमुख जयराम रमेश ने देर रात पोस्ट कर आरोप लगाया कि “पीएम, गृह मंत्री और चुनाव आयोग की मिलीभगत से बिहार में बड़े पैमाने पर वोट चोरी हुई है।”
परंतु इस बयान में वही पुरानी निराशा और नेतृत्व बचाने की कोशिश झलक रही थी। कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह सदमे में था और खुद को आलोचना से बचाने के लिए यही एक बहाना नजर आया।


कांग्रेस के आरोप जनता के बीच क्यों नहीं चले?

कांग्रेस के नेता “संविधान खतरे में है” और “वोट चोरी हुई है” जैसी बातें कहते रहे, लेकिन आम जनता के बीच इनमें कोई ठोस पकड़ नहीं बन पाई।
क्योंकि—

  • वोट चोरी का कोई दिखने वाला सबूत जनता तक नहीं पहुँचा
  • जमीन पर भाजपा को लेकर ऐसा कोई डर नहीं दिखा कि संविधान समाप्त हो रहा है
  • चुनाव आयोग को लेकर कांग्रेस के आरोप जनता को विश्वसनीय नहीं लगे

इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस सिर्फ अपने ‘इको चैंबर’ में बोलती रही और जनता उससे दूर होती गई।


दूसरी तरफ महागठबंधन की अंदरूनी फूट उजागर

बिहार चुनावों में जहां एनडीए संगठित रूप से चला, वहीं महागठबंधन में शुरू से ही असहमति और अव्यवस्था हावी रही—

  • सीट बंटवारे पर लगातार तनाव
  • सीएम चेहरे को लेकर भ्रम
  • कई सीटों पर महागठबंधन दलों का आपस में टकराना
  • आरजेडी से जुड़ी जंगल राज की छवि का भारी नुकसान
  • भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था पर जनता की नाराज़गी

महागठबंधन का अपारदर्शी और अविश्वसनीय गठजोड़ खुद ही अपने वोट काटता रहा, जिसका सीधा फायदा एनडीए को मिला।

उधर एनडीए में अमित शाह, नीतीश कुमार और अन्य नेताओं ने छोटी पार्टियों—जैसे चिराग पासवान की एलजेपी (RV) और जीतन राम मांझी की एचएएम—को पूरा सम्मान देकर सहयोग बनाए रखा। यह महागठबंधन से बिल्कुल उलट तस्वीर थी।


दक्षिण भारतीय कांग्रेस नेताओं के बयानों से भी नुकसान

कांग्रेस को बिहार में अतिरिक्त नुकसान उन बयानों से भी हुआ जिसमें—

  • तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन,
  • कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार

ने खुले तौर पर उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया।

तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने तो बयान दिया—
“कांग्रेस मतलब मुसलमान और मुसलमान मतलब कांग्रेस।”
इस बयान ने बिहार जैसे विविधतापूर्ण राज्य में कांग्रेस को और नुकसान पहुंचाया।


आरजेडी भी अब ‘वोट चोरी’ की रट लगाने लगी

राहुल गांधी की लाइन पर अब आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी ‘वोट चोरी’ का आरोप दोहराने लगे हैं।
जबकि आम सहमति यह है कि—

  • आरजेडी की जंगल राज की छवि,
  • टिकट बंटवारे की अव्यवस्था,
  • महागठबंधन की आंतरिक फूट,
  • भ्रष्टाचार के आरोप,
  • और नेतृत्व की कमजोरी

चुनाव हार का असली कारण थे।

जनता की नज़र में यह “वोट चोरी” नहीं, बल्कि “जंगल राज का डर” था जिसने महागठबंधन को डुबो दिया।


कांग्रेस जब तक भ्रम में रहेगी, भाजपा को ही मिलेगा लाभ

कांग्रेस और आरजेडी अपनी हार का कारण जितना “वोट चोरी” को बताएँगे, जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता उतनी ही घटती जाएगी।
इसके उलट भाजपा की रणनीति जमीन पर काम कर रही है और एनडीए का गठजोड़ अधिक स्थिर और संगठित दिखाई देता है।

जब तक कांग्रेस हार के वास्तविक कारणों को नहीं पहचानती और अपनी राजनीति को ज़मीन से नहीं जोड़ती, तब तक यह नैरेटिव एनडीए के लिए वरदान साबित होता रहेगा।


(विशेष लेख: अमर शर्मा)

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