‘बंदर’ : एक सिहरन पैदा करने वाली सच्चाई  सिस्टम, समाज और इंसान के बीच की खामोश लड़ाई

लेखक: अनिरुद्ध नारायण (इंटर्न)
संपादन: निहाल कुमार दत्ता

समकालीन सिनेमा के दौर में जहां मनोरंजन अक्सर गहराई पर भारी पड़ता है, वहीं ‘बंदर’ एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है, जो न केवल दर्शकों को झकझोरती है बल्कि उन्हें सोचने पर भी मजबूर करती है। यह फिल्म एक बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय को उठाती है, जिसे समाज लंबे समय से नजरअंदाज करता आया है।

फिल्म की कहानी मानव स्वभाव, अहंकार और संस्थागत टकरावों के जटिल परिणामों को उजागर करती है। विशेष रूप से यह उन “जेंडर-बायस्ड कानूनों” के संभावित दुरुपयोग पर प्रकाश डालती है, जिनका असर केवल आरोपी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार, करियर और पूरे न्यायिक तंत्र तक पहुंचता है। चरित्र हनन और मानसिक आघात की जो परतें फिल्म में दिखाई गई हैं, वे लंबे समय तक दर्शकों के मन में बनी रहती हैं।

फिल्म का पहला भाग धीमी गति से आगे बढ़ता है, लेकिन यही धीमापन एक गहरी बेचैनी और तनाव का निर्माण करता है। समर मेहता की दुनिया के बिखरने की प्रक्रिया को बेहद बारीकी से दिखाया गया है। इंटरवल से पहले का हिस्सा दर्शकों को एक तीव्र मोड़ पर छोड़ता है, जो कहानी को और भी रोचक बना देता है।

हालांकि शुरुआती एक घंटे की गंभीरता कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है, लेकिन जैसे ही कानूनी और मनोवैज्ञानिक खेल तेज होते हैं, फिल्म पूरी तरह से पकड़ बना लेती है। दूसरा भाग फिल्म की आत्मा है, जहां निर्देशन का दमदार प्रभाव देखने को मिलता है। पुलिस पूछताछ, जेल का वातावरण और पात्रों के धूसर पक्ष बेहद वास्तविक और प्रभावशाली लगते हैं।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी एक पक्ष की कहानी नहीं कहती, बल्कि आरोपी और आरोप लगाने वाले दोनों के दृष्टिकोण को समान महत्व देती है। यही संतुलन इसे एक परिपक्व और विचारोत्तेजक फिल्म बनाता है।

आज के दौर में, जब डेटिंग ऐप स्कैम, झूठे आरोप और व्यक्तिगत दुश्मनी जैसी खबरें आम हो चुकी हैं, ‘बंदर’ इन सच्चाइयों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करती है। फिल्म का टैगलाइन  “हम सब अपनी जिंदगी के सर्कस के बंदर हैं”  इसके मूल भाव को बेहद सटीक रूप से व्यक्त करता है।

बॉबी देओल द्वारा निभाया गया समर मेहता का किरदार उनके करियर के सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनों में से एक है। एक साधारण व्यक्ति से लेकर मानसिक रूप से टूटते इंसान तक का उनका सफर दर्शकों को भीतर तक प्रभावित करता है। जेल में उनके किरदार का बदलाव बेहद मार्मिक और यथार्थपूर्ण है।

निर्देशन के स्तर पर फिल्म बेहद सशक्त है। बिना किसी अतिरिक्त नाटकीयता के, यह अपनी सादगी और वास्तविकता के जरिए दर्शकों को कहानी में पूरी तरह डुबो देती है। सहायक कलाकारों ने भी अपने अभिनय से फिल्म को मजबूती दी है।

‘बंदर’ जैसी फिल्में इसलिए महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि वे आसान जवाब नहीं देतीं, बल्कि कठिन सवाल उठाती हैं। यह फिल्म समाज को आईना दिखाने का काम करती है और उम्मीद जगाती है कि इससे एक व्यापक संवाद की शुरुआत होगी।

निष्कर्षतः, ‘बंदर’ एक गहन, विचारोत्तेजक और सशक्त सिनेमाई अनुभव है, जो गंभीर विषयों को समझने और महसूस करने वाले दर्शकों के लिए विशेष रूप से बनाई गई है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐✨

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